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भाग – 18
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Satsang Raipur Bhag-18
जिज्ञासा: बाबाजी, जो व्यक्ति आपके दर्शन के संपर्क में आता है उसके लिए आपके सुझाव के रूप में कुछ और स्पष्टता चाहते हैं। इस दर्शन के अनुसार परिवार में नर-नारियों का अधिकार, कर्तव्य, सभी संबंधों में किस प्रकार रहेगा, जैसे पिता-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहन और सभी संबंधों में?
उत्तर: पहले इसे तय किया जाए कि नर-नारियों का समान अधिकार, ऐसा क्यों कहते हैं- समझदारी के लिए हर नर-नारी समान अधिकार रखते हैं। उसका आधार क्या है- शरीर और जीवन का सम्बंध हर नर-नारी में समान है। नारी शरीर को भी एक जीवन चलाता है, नर का शरीर को भी एक जीवन चलाता है। जीवन तृप्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है। मानव शरीर में इंद्रियों का कार्यक्रम है। इंद्रियों के कार्यक्रम के आधार पर बहुत दिन आदमी ने बहुत कुछ करके देखा, उसमें सुख पाने की कोशिश किया, हो नहीं पाया। इसको आप हम सब करीब-करीब सभी ने निष्कर्ष निकाल लिए हैं। कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है तो निष्कर्ष निकल जाएगा। अब, सुख चाहिए, कहाँ मिलेगा- सुख की निरंतरता चाहिए। उसको हम खोज निकाला। वो क्या चीज है- समाधान, समाधान होने से सुखी होते हैं, समाधान की निरंतरता होती है। सम्बन्धों में समाधान, पति-पत्नी के सम्बंधों में समाधान, पिता-पुत्र के संबंधो में समाधान, पुत्र-पुत्री के सम्बन्धों में समाधान, और बंधु-बाँधवों के सम्बंधों में समाधान होने की आवश्यकता है। सम्बंध क्या है- समझदारी से समाधान। समझदारी पूर्वक हम समाधान को प्रमाणित करते हैं और श्रम पूर्वक समृद्धि को प्रमाणित करते हैं। ये दो सिद्धांत को पहले पढ़ा चुके हैं आपको। तो ये दोनों सिद्धांतों को याद रखने की आवश्यकता है जम के। ये दोनों याद रहेगा तो आगे की बात सब पटेगी। हर नर-नारी में नारी शरीर होता है, नर शरीर होता है, जीवन न तो नर होता है ना नारी होता है। इस भ्रम से मुक्ति के लिए काफ़ी हम काम कर चुके हैं और भी ज़रूरत होगी तो काम करेंगे। ये ज़िम्मेवारी तो अपना ही है। इस आधार पर नर-नारियों में ज्ञानार्जन के लिए समान अधिकार है। किस लिए ज्ञानार्जन, जीवन तृप्ति के लिए। जीवन तृप्ति क्या चीज़ है- सुख, शांति, संतोष, आनंद। यह पता चला। यह हमें कैसे पता चला- सुख की बात हम को पता चला पहला। सुख कैसा होता है? समाधान आने से सुख, समाधान, समृद्धि आने से सुख शांति, समाधान, समृद्धि, अभय सम्पन्न होने से सुख, शांति, संतोष और समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व में जीने पर सुख, शांति, संतोष, आनंद, ये निकल गया। ये एक सिद्धांत शाश्वत सिद्धांत के रूप में निकला, प्राकृतिक सिद्धांत के रूप में निकला, अस्तित्व सिद्धांत के रूप में निकला, जागृति सहज सिद्धांत के रूप में निकला। इतने विधा से ये सिद्धांत निकला, निकलने के बाद ये पता चला नर-नारियों के समानाधिकार है। किस बात के? समझदारी के लिए । शरीर में ही नर-नारी होते हैं, जीवन में नर-नारी नहीं होते हैं। ये भी समझ में आ गया। उसके बाद आता है शरीर से हम जो कुछ भी समृद्धि पैदा करते हैं, उसका अधिकार की बात बताते हैं। परिवार में जितना व्यक्ति रहते हैं हर व्यक्ति का उपयोग का अधिकार समान, सदुपयोग का अधिकार समान, प्रयोजनशील होने का अधिकार समान। इसके लिए क्या चाहिए? पहले समाधान सम्पन्न होने के बाद ही मनुष्य उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशील विधि से वस्तुओं को उपयोग करना बनता है। यदि समझदारी नहीं है, इसको उपयोग विधि में ही