गड़बड़ायेगी, सदुपयोग और प्रयोजनशीलता तो दिल्ली दूर वाली बात है। इसीलिए हमको ये ध्यान देने की आवश्यकता है कि हर नर-नारियों में जो सर्वाधिक, सर्वप्रथम अधिकार समझदारी की है। और उसके बाद समृद्धि का अधिकार है, समृद्धि का अधिकार के साथ उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता का अधिकार बना ही है। इसको मैं समझता हूँ इसका विरोध करने का कोई जगह नहीं है। उसके विपरीत सुविधा संग्रह में जाओ हर जगह में विरोध। पति-पत्नी के बीच में विरोध, पिता-पुत्र के बीच मे विरोध हर जगह मे विरोध।वही वस्तुएँ हैं, हर जगह में विरोध, सुविधा संग्रह विधि से। और समाधान विधि से हर जगह में मैत्री। इसको भले प्रकार से अपने को ध्यान में लाने की जरूरत, इसको भले प्रकार से आचरण करने की जरूरत, इसको प्रमाणित करने की ज़रूरत है। वो भी आप लोगों का कुछ सौभाग्य है, कि बहुत सारे लोग आप लोगों से प्रेरणा पाने के लिए आते हैं, आप लोगों को प्रमाणित रहने की भी बहुत ज़रूरत है। तो हर सम्बन्धों में समानाधिकार को अनुभव करना।
अभी जैसा इसको लेकर के बहुत सारे लोग हमसे प्रश्न किए कि वहाँ जो अछोटी में कुछ लोग काम करने वाले हैं, उन लोगों के बारे में क्या सोचना है। उन लोगों के बारे में मैं ये आश्वासन देता हूँ कि वो यदि Permanently रहना चाहते हैं तब वहाँ का भागीदारी बनाएंगे। यदि permanently रहना चाहते हैं तब भागीदारी होंगे, permanently नहीं रहेंगे, आगंतुक रूप में जैसा होता है वैसा हो ही जाएगी। ये बात हम बताता हूँ। ठीक है? यह उत्तर ठीक है?
उसके लिए अभी आपने बताया माताजी गई थी, किसी की बात थी, उन्होंने समझाये वो समझ भी गये, प्रतिज्ञा भी किया है बताते हैं (दोनों पति-पत्नी में काफ़ी लड़ाई- झगड़ा था वो खतम होते जा रहा है बाबा)। वही बात, ये होगा ही, जब कभी भी आदमी मे सद्बुद्धि उदय होगा, झगड़ा तो पहले खतम होगा। उसके बाद समाधान, समाधान से सुख, समृद्धि आने पर सुख, शांति। ये दोनों आ जाता है, अभय आता ही है, भय से मुक्ति का दिन आता ही है। भय से मुक्ति मिल गई तो और सोने में सुगंधी आ गया। उसके बाद सहअस्तित्व में प्रमाण हो गया, माने हम पूरे ही हो गये। मानव लक्ष्य ही पूरा हो गया। ये चार मुद्दा यदि मानव परंपरा में आता है उसके लिए हम पहले कहे हैं परिवार में हम व्यवस्था को पहचानें। परिवार मे व्यवस्था को पहचानने क्या मिला- समाधान, समृद्धि दो चीज मिला। दो चीज को हम प्रमाणित करें, उसके बाद ऐसा 10, 20, 1000 परिवार मिल करके हम थोड़ा सा विस्तार रूप मे व्यवस्था को प्रमाणित करें, उसमें से पड़ोसी से भय समाप्त हो जाता है। अभी तक यही माना जाता है कहीं जगह में कोई भी ज़्यादती हो पड़ोस के साथ ही मिल करके ज़्यादती बनती है। अब इस बात को बहुत सारे विधि से पचतंत्र मे (चाणक्य का पंचतंत्र मे) बहुत सारा बात लिखा है। हम पढे हैं, ये सब तो लिखा है बेकार बातों को, उस ओर अपने को जाने की जरूरत ही नहीं। अपन अपने विधि से क्या कहा- नर-नारियों मे समान अधिकार है, उसको हर व्यक्ति स्वीकारते हुए जीना। उसका प्रमाण क्या होगा- उपयोग होना होगा परिवार में, सदुपयोग होना है समाज में, और व्यवस्था में प्रयोजन शील होना है। अभी अपने अछोटी के सीमा में स्वाभाविक रूप में समाज का संपर्क भी है, व्यवस्था का भी संपर्क है। इन दोनों विधा में वस्तुओं को अपने परिश्रम से जो कुछ भी हम पैदा करते हैं उसका सदुपयोग और प्रयोजन शील बनाने के लिए ही प्रयत्नशील रहना चाहिए। वो ही चीज अमरकंटक में आपको दिखेगी, दिखता है कि नहीं दिखता है ( दिखता है बाबा, वहीं से प्रेरणा मिलता है बाबा)।संयोग रहा, अमरकंटक में एक ऐसा संयोग हुआ, सरकार एक notice भेज दिया वो धर्मशाला खाली करो, उसके आधार पर ये भी अभी तैयार हो गया। मानसिकता तैयार हो गया, बनी ही रहा है, बन ही जाएगा। तो उससे दूसरा और एक अभिशाप की मुक्ति हुई, तो हम समृद्धि को