घोषणा करते रहे, कोई ना कोई आदमी ऐसा सोच ही सकता था, अपना बच्चे को एक कुटिया नहीं बनाया, घोसला नहीं बनाया और ये अपने को समृद्ध घोषित करता है, ऐसा तो डाँट ही सकते थे। वो भी अभिशाप मुक्ति मिल गई। मैं आपको यह बात रहा हूँ, ठीक बात हुआ कि नहीं। ये हम कल्पना ही नहीं किये थे, अपने आप से आ गई ये। ये सब चीजें स्वभाविक रूप में कोई एक संपदा आती है उसके साथ 10 संपदायें बिना बुलाए आते हैं। इस बारे में कहा। तो इस ढंग से चल कर के वहाँ आप ये भी देखेंगे वहाँ सबके पास एक ही अधिकार है उपयोग करने का, वस्तुओं को उपयोग करने का समान अधिकार वहाँ रखा हुआ है। परिवार के सभी लोगों के साथ, इसको तो आप देखते ही हो, ये भी एक बात बन गई। इस ढंग से हम समाधान, समृद्धि पूर्वक जीने से परिवार जनों के बीच में समान अधिकार का अनुभव करना ही पड़ेगा दूसरा कुछ होता ही नहीं। ये कैसा बनाता है बताया। आयु के अनुसार कार्य कर्तव्य। इसमें मैंने जो अनुभव किया, किसी आयु के बाद बच्चों को अपने विवेक से जीने के लिए अधिकृत करना चाहिए, हर परिवार में। यह समझदार परिवार में ही सम्भव है भ्रमित परिवार में ये सम्भव नहीं है। 

तो एक सद्गृहस्थ के यहाँ हम गए थे,( रस्तोगी को आप जानते हैं, उनके ससुराल।) उनके ससुर कई वर्षों से बीमार बिस्तर में पड़े थे, उस अवस्था में हम गए थे। उनके बच्चों से मिले। अभी बच्चों के सामने पिता बिस्तर पर पड़े हैं बच्चों का मन ये है, हमारा पिता हम को स्वतंत्र रूप से जीने नहीं दे रहे हैं। उसको कैसे बताया जानते हो, कि वटवृक्ष के नीचे कोई फूस भी नहीं पनपता, दूसरे कोई वृक्ष ही नहीं होता। ऐसा भाषा बताया। इससे अच्छा क्या बताएगा आदमी, गंभीरता से आप ही सोचो। ऐसा उनके बच्चे बोले। उस समय उनका बड़ा लड़का ५० वर्ष से अधिक ही होगा। 

अभी हमारे यहाँ बच्चे बहुत समझदार हो गए हैं ऐसा मैं घोषणा नहीं कर रहा हूँ, किंतु मैं अपने तरफ से सारी ज़िम्मेवरीयों को उन्हीं के ऊपर छोड़ा। अभी वो घर बन रहा है। घर कैसा बन रहा है, उसको देखने के लिए जब १०-५० बार वो कहते हैं तब एक बार जाता हूँ। अभी तक दो बार गया हूँ। एक बार स्थान पूजा करते समय में गए थे। हमारा विश्वास है उनको रहना है उनके अनुसार सुविधाजनक विधि से वो सोचेंगे समझेंगे करेंगे। जितना हो सकता है उसी का अधिकार है उनको, उनका अधिकारी उतना ही है। जितना अच्छा बना लेंगे उतना ही अधिकार है। आप बनाओ रहो, आप रह करके कोई जगह बचता है तो हमको बताना, मैं भी रहूँगा। हम तो धर्मशाला में रहना है। इसमें क्या हो गया, हमारा कोई अधिकार नहीं है, वो बच्चों के नाम से जमीन का registry  कराया। उसके बाद हम जब तक रहेंगे स्वाभाविक है हमारे बंधुओं के साथ हम रहेंगे ही, हम रहेंगे तो हमारे बंधुएं सब रहेंगे ही। ये तो उसको नकारा नहीं जा सकता। ऐसे ही वो घर ही बना है, उस ढंग से बनी हुई है। कभी भी जा के देखेंगे उनको ना, तो हम dictate करता हूँ ऐसा करो तैसा करो, ये ज्यादा हो गया कम हो गया, कुछ नहीं।

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