का दो पक्ष स्थापित होता है जिसमें से इंद्रिय संवेदना सापेक्ष मनोविज्ञान प्रचलित हो चुका है। जिसके लोकव्यापीकरण होने के उपरान्त भी मानव परम्परा श्रेष्ठ समाज की अर्थात् व्यक्ति समुदाय मानसिकता के चुंगल से छूटकर अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सहज मानसिकता एवं व्यवस्था बन नहीं पायी।
इसका मूल कारण इंद्रिय संवेदनाओं को सत्य मानना रहा अथवा अनिवार्य मानना रहा। जबकि जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण ध्रुवों के आधार पर मानव संचेतनावादी मानसिकता (अथवा मनोविज्ञान) स्पष्ट हो जाता है क्योंकि मानव संचेतना का तात्पर्य ही है जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने में तृप्ति और उसकी निरंतरता का नित्य वर्तमान होना। ऐसे वर्तमान होना मानव परम्परा में ही प्रमाणित होना सहज है।
जानने-मानने और पहचानने-निर्वाह करने के लिए अस्तित्व ही सम्पूर्ण वस्तु है। अस्तित्व में ही जीवन और जीवन जागृति प्रमाणित होती है तथा अस्तित्व में ही रासायनिक द्रव्यों से गर्भाशय में रचित रचना रूपी मानव शरीर भी सहज सुलभ होता है। यह दोनों अर्थात् जीवन जागृति और मानव शरीर के सहअस्तित्व में ही मानवीयता सहज वैभव का प्रमाणित होना पाया जाता है। इस प्रकार मानव परम्परा में ही जीवन जागृति प्रमाणित होने की नियति सहज व्यवस्था है। नियति का तात्पर्य अस्तित्व में नियम पूर्ण स्थिति-गति से है। नियम ही न्याय, न्याय ही धर्म, धर्म ही सत्य, सत्य ही अस्तित्व और अस्तित्व ही नियम के रूप में देखने को मिलता है। इन सभी स्थितियों को सत्यापित करने वाला मानव ही है। इसे सत्यापित करने के लिए अस्तित्व ही सम्पूर्ण वस्तु है। अस्तु, अस्तित्व ही त्रिकालाबाध सत्य है। ऐसा होने के कारण जो कुछ भी सत्यापन मानव करता है उसका अस्तित्व सहज होना परम आवश्यक है यह समझ में आता है। समझने का तात्पर्य भी जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही है। समझने वाली वस्तु जीवन्त मानव ही है। इस प्रकार दोनों ध्रुव स्पष्ट हो जाते हैं। समझने वाली वस्तु जीवन है। समझने के लिए सह अस्तित्व ही है। इस प्रकार जीवन ही दृष्टा है यह स्पष्ट हुआ। देखने वाला ही समझ सकता है। देखने का तात्पर्य भी समझना ही है। इसमें और भी खूबी यह है कि जीवन भी अस्तित्व में अविभाज्य है। इस प्रकार अस्तित्व ही सभी अवस्थाओं में है, यह स्पष्ट हो जाता है यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, ज्ञानावस्था। ज्ञानावस्था में जागृति पूर्वक ही व्यवस्था है। जागृत स्थिति में प्रमाणित परंपराएँ नियति सहज व्यवस्था हैं। नियति का तात्पर्य भी नियमपूर्ण स्थिति-गति से है। नियमपूर्ण स्थिति-गति हर अवस्था में देखने को मिलती है। इस प्रकार जीवन