“सब कुछ होने” के तात्पर्य में ध्रुवीकृत बिंदू यही है कि मानव कितने ही प्रश्न और जिज्ञासा करता है, उन सबका उत्तर मिल जाय और व्यवहार में प्रमाणित हो जाय। देखने को यही मिल रहा है कि जितने भी जिज्ञासा और प्रश्नों को समाधानित करने के प्रयास हुए उसके उपरान्त भी प्रश्न चिन्हों की संख्याएँ बढ़ती गई। आदर्शवादी चिंतन, जनमानस में आस्था के रूप में (अर्थात् नहीं जानते हुए भी मानने के रूप में) है। इस प्रकार आस्थाओं में विविधता हुई। न जानते हुए मानने के आधार पर अंतर्विरोध हुआ यही प्रश्नों की स्थली है। द्वितीय प्रकार के अनुसंधान यंत्र प्रमाण तक पहुंचकर व्यवहार प्रमाण में प्रमाणित होने में असमर्थ हुए फलस्वरूप विद्वानों में भी अंतर्विरोध हुआ तथा यांत्रिकता और संचेतना के बीच प्रश्न चिन्ह बनते गए। यही प्रश्न चिन्हों में वृद्धि होने की स्थली दिखाई पड़ती है। चतुर्थ प्रकार का चिंतन - अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन।

अस्तित्व मूलक, मानव केन्द्रित चिंतन

सहअस्तित्व दर्शन बनाम मध्यस्थ दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण का प्रतिपादन सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज के अर्थ में व्याख्या विश्लेषण सहित प्रस्तुत है। विगत चिंतन क्रम में मानव अभी तक योग-संयोग से, अथक प्रयास से सूझ-बूझ तैयार कर पाया। इन सबके पश्चात जो जिज्ञासाएँ, प्रश्न चिन्ह विविध प्रकार से समीचीन हैं, इन सबका उत्तर और समाधान अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन है क्योंकि अस्तित्व ही सहअस्तित्व के रूप में नित्य समाधानित है। अस्तित्व में ही मानव भी अविभाज्य है, जीवन भी अस्तित्व में अविभाज्य है। अस्तित्व में ही अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में आचरण है। इन तीनों बिंदुओं को जानना-मानना, पहचानना और निर्वाह करना ही पूर्ण दर्शन, पूर्ण ज्ञान एवं पूर्ण आचरण का तात्पर्य है।

इसी क्रम में मानव और मानव में अंतर्सम्बन्ध सहज क्रियाकलाप स्पष्ट होता है। यही आचरण, वाणी अर्थ संबंध सहज क्रियाकलाप बनाम भाषा आचरण; व्यवहार कार्यकलाप बनाम संबंध सहज आचरण; व्यवस्था बनाम सर्वतोमुखी समाधान सहज आचरण के लोकव्यापीकरण करने की सम्पूर्ण संभावना समीचीन है।

आचरणों की विविध विधाओं में से जागृत जीवन सहज आचरणों को देखने पर पता चलता है कि संख्या के रूप में 122 (एक सौ बाईस) आचरणों को देखा गया है। इन-इन के नाम सहित

Page 30 of 205
26 27 28 29 30 31 32 33 34