अध्याय - 4
अनुसंधान और लोकव्यापीकरण
मानव सहज रूप में निरंतर अनुसंधान, शोध और प्रयास करते आया। मानव परम्परा में सुदूर विगत से तीन अनुसंधान प्रधान है। एक अनुसंधान है रहस्यमयी ईश्वर केन्द्रित चिंतन प्रणाल जिसका मूल आशय यह है कि “ईश्वर से सब कुछ होता है।” इसका लोकव्यापीकरण शिक्षा के माध्यम से सम्पन्न किया गया। दूसरा अनुसंधान अस्थिरता मूलक वस्तु केन्द्रित चिंतन, इसका आशय है “वस्तु से सब कुछ होना”। वस्तु केन्द्रित चिंतन का भी लोकव्यापीकरण शिक्षा के माध्यम से संपन्न हुआ है। तीसरी विधि से किसी देवी, देवता, दिव्य पुरुष से अथवा मूर्ति से सब कुछ होता है। इसका भी यथाविधि अनुसंधान हुआ। वांग्मय बना। प्रकारान्तर से इसका भी लोकव्यापीकरण हुआ। इनको क्रम से (1) ईश्वरवाद बनाम अध्यात्मवाद। (2) भौतिकवाद बनाम द्वंद्ववाद और (3) देववाद बनाम अधिदैवीवाद नाम दिया गया है। इनमें प्रमाण विधियों के लिए आदमी तरसा एवं तरने, तारने का प्रयास किया। इन तीनों प्रकार के अनुसंधानों में शब्द को प्रमाण माना गया। मानव, ईश्वरीय व अध्यात्म और देवी-देवता व आदर्शों को मानते आये हैं।
पहली विधि से अध्यात्म, अतिगहन आदर्श है, मौन है, निर्विशेष है और आचरण के रूप में विरक्तिवादी (साधन चतुष्टय सम्पन्नता) है। तृतीय प्रकार के चिंतन का आदर्श उन-उन देवी देवताओं के नाम से प्राप्त वांग्मय का उच्चारण सहित ऐतिहासिक स्मृतियों अथवा कल्पित स्मृतियों से चित्रित रूप में जो व्यक्त रहते हैं उनको आदर्श पुरुष, आदर्श चरित्र, आदर्श ज्ञान और दर्शन मानते हैं। यह परम्परागत के रूप में भक्ति के रूप में आया रहता है। ऐसे आकार प्रकार के स्मारक और स्मारक स्थलियों को आदर्श स्थान मानना कार्यक्रम है। इन दोनो, प्रथम और तृतीय दोनों चिंतन में एक साम्यता है कि सामान्य व्यक्तियों को स्वार्थी, अज्ञानी और पापी के रूप में निरुपित करना और उससे मुक्ति दिलाने के लिए प्रकारान्तर से दिया गया आदर्शात्मक दर्शन, आदर्शात्मक ज्ञान के आधार पर कार्यक्रम प्रस्तुत करना। इसी के साथ उपासना और उपासना के कर्मकाण्डों का भी लोकव्यापीकरण करने की प्रक्रिया सम्पन्न होते आई। द्वितीय प्रकार (भौतिकवाद) के अनुसंधानों का प्रमाण यंत्रों के रूप में प्रस्तुत हुआ।