अध्याय - 3

मानव सहज उपयोगिता-पूरकता

अस्तित्व में मानव एक अविभाज्य इकाई है। मानव का स्वरूप शरीर और जीवन के सहअस्तित्व में प्रमाणित है - जिसमें से जीवन नित्य है क्योंकि जीवन “परिणाम के अमरत्व” सहज फलन चैतन्य पद एवं ज्ञानावस्था में वैभवित है। ऐसा जीवन शरीर को जीवन्त रखते हुए, जागृत जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता के आधार पर संचालित होना पाया जाता है। शरीर संवेदना के क्रियाकलाप जीवंतता के आधार पर ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों का कार्य संपादित हो पाता है। कर्मेन्द्रियों का क्रियाकलाप जीवन्तता स्पष्ट न रहते हुए भी कुछ क्षण, कुछ दिन, कुछ मास और वर्ष तक भी पराधीनता विधि से सप्राणित रह सकता है अर्थात् श्वास और हृदय क्रिया चल सकती है। इस अवस्था में मानव सहज परिभाषा का कार्यकलाप नहीं हो पाता, इसका प्रमाण कई लोग देख चुके हैं। अस्तु, शरीर सप्राणित रहना भी आवश्यक है। यह तथ्य ऊपर स्पष्ट किए गए विश्लेषण से निश्चित होता है। जीवन्तता, जीवन का ऐश्वर्य है। श्वास लेने-छोड़ने की प्रक्रिया प्राण कोशाओं से रचित शरीर रचना की महिमा है।

इस प्रकार जीवन और शरीर के संयुक्त रूप मानवपरम्परा की स्थापना सहअस्तित्व सहज प्रकटन के रूप में दिखाई पड़ती है। सहअस्तित्व मूलतः अस्तित्व ही है इस कारण नैसर्गिकता सहज प्रकृति में सहअस्तित्व प्रमाणित होना नित्य प्रसवशीलता है। प्रसवशीलता का तात्पर्य विविध अवस्थाओं में वैभवित प्रकृति सहज मौलिकता और सम्बंधों से है। ऐसी मौलिकताओं के मूल में परस्पर पूरकता का होना दिखाई पड़ता है, जैसे- ऊर्जा रूपी सत्ता में संपृक्त प्रकृति का परस्पर पूरक होना स्पष्ट है क्योंकि सत्तामयता में ही सम्पूर्ण प्रकृति प्रमाणित है, वैभवित है। सम्पूर्ण प्रकृति ही सत्तामयता सहज प्रमाणों को क्रियाशीलता के रूप में प्रस्तुत करते आयी है। इसी क्रम में सम्पूर्ण प्रकृति के विविध अवस्थाओं और पदों में वैभवित रहना हमें अध्ययनगम्य है।

सहअस्तित्व सहज इस धरती पर चार अवस्थाओं में जैसे - पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था में प्रकृति का वैभव देखने को मिलता है। यही प्राणपद, भ्रांतिपद, देवपद और दिव्यपद में वैभवित रहना अध्ययनगम्य है। जैसे - पदार्थावस्था का आंशिक तत्व प्राणावस्था में, प्राणावस्था विरचित होकर पदार्थावस्था में परिवर्तित होता हुआ देखने को

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