अध्याय - 2

मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का आधार

मानवीयता पूर्ण आचरण को पहचानने का आधार अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान है। यह चिंतन अस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से सहज सुलभ हुआ है। सहज का तात्पर्य प्रत्येक मानव में, से, के लिए अध्ययन मूलक प्रणाली से बोधगम्य होने से और अनुभव मूलक प्रणाली सहित अभिव्यक्त होने से है। सुलभ का तात्पर्य इसके लोकव्यापीकरण होने की संभावना, आवश्यकता और प्रयोजन से है। अस्तित्व ही नित्य वर्तमान है। इस रूप में सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सहअस्तित्व होना प्रतिपादित एवं व्याख्यायित हुआ है। नित्य वर्तमान सहज सहअस्तित्व में ही सम्पूर्ण भाव, क्रिया, स्थिति, गति और अस्तित्व सहज प्रयोजन (पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञान अवस्था) निरंतर प्रमाण रूप में देखना मानव में, से, के लिए सहज है। जिसमें से मानव ज्ञानावस्था में मनुष्येतर सम्पूर्ण जीव जीवावस्था में; सम्पूर्ण अन्न वनस्पतियाँ प्राणावस्था में; और अन्य सभी वस्तुएं पदार्थावस्था में सूत्रित एवं व्याख्यायित हैं। व्याख्यायित होने का तात्पर्य प्रकाशित होने से है। अस्तित्व ही नित्य प्रकाशमान है, विद्यमान है। यह प्रधानतः चार अवस्थाओं में इस धरती पर प्रमाणित हैं। इस धरती में स्थित परम्परा सहज मानव अध्ययन करने की इकाई है। इस विधि से मानव ही अध्ययन करने वाली इकाई है जिसके आधार पर वह कार्य व्यवहार करने वाला है। अध्ययन पूर्वक ही मानव समझदार होता है।

अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है यह समझ में आता है। समझने का तात्पर्य जानने और मानने से है। अध्ययन में, से, के लिए मानव में, से, के लिए तीन मुद्दे देखने को मिलते है। देखने का तात्पर्य समझना है यह -

(1) अस्तित्व दर्शन ज्ञान (2) जीवन ज्ञान (3) मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही है। मानव चेतना के लिए ये तीन मुद्दे हैं। अस्तित्व सहज रूप में यह धरती अनन्त ब्रह्माण्डों अथवा अनंत सौर व्यूहों में, से एक सौर व्यूह में स्थित है। यह धरती अपने आप समृद्ध होने के उपरान्त मानव से भी समृद्ध हुई है। इस धरती पर मानव सहज अवस्थिति के अनंतर मानव जो कुछ भी अपनी कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता के चलते अभी तक भय, प्रलोभन, आस्थावादी परिकल्पना में उथल पुथल होना देखा गया, यह जागृति क्रम घटना में गण्य है। “जागृति सहज अभिलाषा

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