विकास परमाणु में होता है। परमाणु में गठनपूर्णता होना अवश्यम्भावी क्रिया है जो संपन्न होती है। गठनपूर्ण परमाणु चैतन्य इकाई या जीवन के नाम से जाना जाता है। 

 ऐसे गठनपूर्णता परिणाम का अमरत्व रूप में प्रमाण प्रस्तुत है। ऐसे गठनपूर्ण परमाणु स्वयं में जीवन रूप में विद्यमान है। ऐसे ही कुछ जीवन जीव शरीरों को चलाने में कुछ मानव शरीर को चलाने में अभ्यस्त हैं। मानव शरीर को चलाने वाले सभी जीवन सुखी होना चाहते हैं। सुखी होने के लिए मनाकार को साकार किया हुआ है इसी क्रम में मनःस्वस्थता एक आवश्यकता है। मनःस्वस्थता अपने स्वरूप में सर्वोतोमुखी समाधान रूप में प्रमाण है। यह समझदार मानव में प्रमाणित होना पाया गया। समझदारी ज्ञान, विवेक विज्ञान सम्पन्नता ही है। यह प्रमाणित होना ही जागृत मानव का मतलब है। 

जागृतिपूर्वक ही क्रियापूर्णता आचरणपूर्णता प्रमाणित होता है। ज्ञान विज्ञान विवेक सम्पन्नता के लिए अध्ययन ही एक मात्र आधार है। अध्ययनपूर्वक ही मानव सर्वतोमुखी समाधान सहज विधि से अभिव्यक्त होना संप्रेषित होना पाया गया है। यही अखण्ड समाज सूत्र है। इस सूत्र के अनुसार हर मानव व्याख्यायित होने की स्थिति में अखण्ड समाज की सूत्र व्याख्या स्वयं सिद्ध हो जाता है। 

आज की स्थिति में हर मानव सुरक्षित होना संभव है। समुदाय चेतना विधि से मानव चलकर हर तरीके से समस्याओं को मोल चुका है। समस्याएं दुख का कारण हैं। 

10 -जागृत मानव ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित करते हैं इसकी आवश्यकता बनती है।

मानव जागृत होने का प्रमाण सहअस्तित्व को विधिवत अध्ययन करने के उपरान्त अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित करना है। अध्ययन करने में मानव ध्यान देना आवश्यक है। अध्ययन के उपरान्त प्रमाणित करने में ध्यान देना आवश्यक है। 

सहअस्तित्व सहज अनुभव ही जागृति का प्रमाण है। जागृति के अनन्तर हर मानव समुदाय चेतना में अखण्ड समाज चेतना में परिवर्तित होना पाया जाता है। यह परिवर्तन ही जागृति है। मानव एक ही जाति में होना समझ में आता है। 

मानव जाति एक होने के आधार पर सुख के रूप में समझ में आता है। सुख रूपी मानव धर्म समाधानपूर्वक प्रमाणित होता है। ये सहअस्तित्व में अनुभव होने की महिमा है। सहअस्तित्व सहज अध्ययन ही अनुभव होने का स्रोत है। सहअस्तित्व सहज अध्ययन के लिए स्रोत है मध्यस्थ दर्शन - सहअस्तित्ववाद। इसमें संबधित सभी वाङ्मय (किताबें) उपलब्ध है। 

चारों अवस्थाओं के अध्ययन से चारों अवस्थाएं परस्पर उपयोगिता व पूरकता के अर्थ में जुड़े हैं यह तथ्य समझ में आता है। क्योंकि इस धरती पर पदार्थावस्था के अनन्तर प्राणावस्था प्रकट हुआ है। जीवावस्था और ज्ञानावास्था के

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