शरीर रचना भी प्राणावस्था के प्राणकोषा से ही रचित रहता है। इन कोशाओं में गुणात्मक परिवर्तन विधि भी बनी रहती है। इसकी गवाही में अनेक प्रकार के वनस्पति देखने को मिल रहे हैं। इसी में गुणात्मक विकास द्वारा जीव शरीर व विकास से ज्ञानावस्था के मानव शरीर बने। जीवन अस्तित्व में रहता ही है। क्योंकि जीवन गठनपूर्ण होने के उपरान्त क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता के रूप में प्रमाणित होना है। नहीं तो जीव शरीर को चलाना ही होता है।
मानव परम्परा में ही अध्ययन करने का और अनुभव करने का अवसर बनी। इसी आधार पर सर्वमानव में कल्पनाशीलता व कर्म स्वतन्त्रता कार्यरत रहना होता है। इसी के आधार पर मानव मनाकार को साकार करना और मनःस्वस्थता को प्रमाणित करता है। मनःस्वस्थता का प्रमाण न्याय धर्म सत्य को प्रमाणित करना ही है।
न्याय मानव की परस्परता में, मनुष्येतर प्रकृति की परस्परता में प्रमाणित होता है। फलस्वरूप मानव में सन्तुष्टि व मनुष्येतर प्रकृति में संतुलन बनता है। जिसकी आवश्यकता सर्वमानव में होना पाया जाता है।
धर्म अपने स्वरूप में सुखी होना ही है। यह मानव परम्परा में समाधान के रूप में मनुष्येतर प्रकृति के साथ नियम नियन्त्रण के रूप में क्रियान्वयन होना पाया जाता है। यही जीवन विद्या की अपेक्षा है। मध्यस्थ दर्शन – सहअस्तित्ववाद का उद्देश्य यही है।
मानव सुखी होने के लिए आतुर-कातुर रहता ही है। समाधान समृद्धि अभय सहअस्तित्वपूर्वक सर्वमानव सुखी होना पाया जाता है। सहअस्तित्व सहज प्रमाण दस सोपानीय व्यवस्था के रुप में ही इसे प्रमाणित करता है। यह हर जागृत मानव के रूप में सहज प्रवृत्ति है। इसीलिए जागृत मानव परम्परा ही इस धरती पर परम्परा सहज निरन्तरता बनाये रखना स्वभाविक है।
समुदाय चेतना विधि से, बैर-विरोध से मुक्त नहीं हो पाया। बैर-विरोध जब तक है मानव सुखी होना संभव नहीं है। यह जागृति सहज परम्परा व समाधानपूर्वक ही प्रमाणित हो पाता है।
अखंण्ड समाज ही सार्वभौम व्यवस्था का प्रमाण हो पाता है। कोई समुदाय अखण्ड समाज चेतना को प्रमाणित करने में असमर्थ है। इसीलिए सहअस्तित्ववादी विधि से जीना आवश्यक होगा ही। क्योंकि युद्धोन्माद लाभोन्माद को बनाये रखने के आधार पर मानव हर समुदाय धरती को बर्बाद करने में लग चुके हैं। धरती बर्बाद हो जाए तो मानव कहाँ रहेगा, इसका उत्तर कौन समुदाय बतायेगा।
आज की स्थिति में अर्थात् लाभोन्माद युद्धोन्माद प्रभावित रहते हैं। कोई समुदाय में उत्तर देने का मार्ग नहीं है।
इसका उत्तर केवल सहअस्तित्व मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन से बोध होना संभव हो गया। इसको कुछ लोग अध्ययन कर देख चुके हैं। सर्वशुभ चाहने वाले मानसिकता के लिए ये अध्ययन सुलभ होता देखा गया। अपने समुदाय को परिवार को व्यक्ति को शोषण विधि से सुविधा संग्रहपूर्वक सुरक्षित होने की कल्पना जब तक है तब तक संघर्ष से मुक्त होना संभव नहीं। संघर्ष अन्ततः शोषण युद्ध में ही अन्त होता है। युद्ध व शोषण ये दोनों अखण्ड समाज चेतना व नियति सहज नियमों के विरोधी हैं।