- गुरु-शिष्य,
- पुत्र-पुत्री,
- साथी- सहयोगी,
- मित्र-मित्र,
- पति पत्नी
इसमें से पति-पत्नी संबंध को छोड़कर सभी सम्बन्ध मित्रवत होते हैं। इस ढंग से बहुत विस्तार तक हम संबंधों को संबोधित करने में समर्थ हो चुके हैं। इन संबंधों से होने वाले प्रयोजन समझना आवश्यक है। यह मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने के क्रम में स्पष्ट होना पाया जाता है।
सभी संबंध व्यवस्था में प्रमाणित होने, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के अर्थ में उपयोगी पूरक सार्थक होना पाया जाता है। इसी के साथ माता-पिता पुत्र-पुत्री के साथ मानवीयतापूर्ण विधि से जीने की अपेक्षा रखता है। मानवीयता की अपेक्षा सभी समुदायों में बनी हुई है।
मानवीयतापूर्ण आचरण ही मानवीयता का आधार है। मानवीयता का विस्तार ही संबंधों में प्रमाणित होना है। मानवीयतापूर्ण आचरणपूर्वक सभी संबंधों में विश्वास निर्वाह होता है। संबंधों को पहचानना, मूल्यों को निर्वाह करना, सबसे पहले विश्वास मूल्य को निर्वाह करना, मूल्यांकन करना व परस्पर तृप्ति पाना।
मानवीयतापूर्ण आचरण का दूसरा आयाम चरित्र, स्वधन, स्वनारी, स्वपुरुष व दयापूर्ण कार्य व्यवहार करना।
तीसरा आयाम नैतिकता। हर व्यक्ति में कम से कम परिवार में पाये जाने वाले तन मन धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा करना। सदुपयोग करने में परिवार में नियोजन, उपयोग, अखण्ड समाज के अर्थ में नियोजन, उपयोग सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में नियोजन प्रयोजनशील होना पाया जाता है। इस प्रकार हर मानव-परिवार सार्वभौम व्यवस्था के रूप में जीना ही सार्थकता है।
मानवीयता पूर्ण आचरण ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का मूल रूप है। समझदार मानव परिवार में ये मानवीयतापूर्ण आचरण परस्परता में प्रमाणित होता है। आचरण ही अखण्ड समाज का सूत्र है। संबंधों का निर्वाह होना, संपूर्ण संबंधों में विश्वास होना समाज रचना का सूत्र है।
ऐसे समझदार परिवार व्यवस्था के रूप में जीता है। तब यही परिवार सभा के रूप में गण्य होता है।
7 - मानवीय व्यवस्था (अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था)
विश्वास और विश्वास निरन्तरता व्यवस्था :-
मानव व्यवस्था में भागीदारी करने का उद्देश्य मानव लक्ष्य प्रमाणित करना।