परिवार में ही सभी प्रकार के संबंध हैं। वहीं पर संबोधन सुलभ रहता है। प्रयोजन के अर्थ में आचरण व्यवहार करना जागृत मानव का एक स्वभाव है। इसका विरोध संभव नहीं। भले ही भ्रमित परिवार में भी इसके योग्य न होते हुए भी इसे नकारना बनता नहीं।
भ्रम से मुक्त जागृतिपूर्ण कार्य व्यवहार सर्वमानव को स्वीकार होता है। इसी आधार पर परिवार में भी स्वीकृत होता है। सहीपन का स्वीकार स्वभाविक है।
जागृत मानव सहीपन का प्रमाण होता ही है। मानव नियति विधि से ज्ञानावस्था में होने के आधार पर नियतिसहज नियम नियन्त्रण सन्तुलन, न्याय धर्म सत्यसहज ज्ञाता, प्रमाणसहज अभिव्यक्ति का होना पाया जाता है। यही जागृति है।