इस प्रकार मनाकार को साकार करता हुआ, मन: स्वस्थता का आशावादी ओतप्रोत मानव जाति को असंदिग्ध रूप में देखा जा रहा है| इसमें मार्मिक बिंदु यही है की उपरोक्त विवेचन के अभाववश न्याय का ध्रुवीकरण आज तक नहीं हो पाया। 

मध्यस्थ दर्शन ने न्याय कि ध्रुवीकरण में यह घोषणा की है, की मानवीयता की अभिव्यक्ति जो शिष्टता के रूप में प्रकाशित होता है जिसके निर्वाह मानवीय सम्बन्ध मूल्यों पर आधारित है। नीति से समाज में, विश्व में शान्ति तथा अंतर्राष्ट्रीय में सामंजस्य संभव बनाया जा सकता है। इस स्थिति में मध्यस्थ दर्शन एक मार्गदर्शक के रूप में उपलब्ध है। यह उपलब्धि मानव में पाई जाने वाली चिरकालीन वांछा, आकांक्षा एवं पूर्ण तृषा की पूर्ति के लिए परिपूर्ण एवं परिहार्य है।

मध्यस्थ दर्शन में प्रकृति में पाई जाने वाले क्रिया एवं जीवन के संबंध में पदार्थावस्था को अस्तित्व सहित संघर्षात्मक जीवन तथा प्राणावस्था को अस्तित्व संघर्ष सहित पुष्टयात्मक प्रक्रिया में रत जीवन बताया है। जीवन मात्र को आशावादी जीवन के स्वरूप में स्पष्ट करते हुए उसकी सत्यता को जीवन की आशा से सम्पन्न बताया है। मनुष्य को बुद्धिजीवी बताते हुए बौद्धिकता की सत्यता को दो परिप्रेक्ष्यों में स्पष्ट किया गया है- 1) विज्ञान और 2) विवेक। मध्यस्थ दर्शन ने बौद्धिकता की परिपूर्णता को विवेक और विज्ञान की सीमा में निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य के समग्रता को बताया है, और साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि विवेक के बिना विज्ञान, विज्ञान के बिना विवेक जीवन की अपूर्णता के द्योतक हैं। मानव की बौद्धिकता को पूर्णतया चैतन्य पक्ष की क्षमता, योग्यता एवं पात्रता बताते हुए प्रमाणों सहित यह बताया गया है कि रासायनिक सीमा के अतिरिक्त यह सीमा गठन की पूर्णता के अनंतर विकासपूर्वक पाई गई एक अर्हता है। इससे स्पष्ट हो जाता है की मनुष्य बुद्धिजीवी है, ना कि रासायनिक। इस स्पष्ट तथ्य को सर्व सुलभ करने की व्यवस्था मध्यस्थ दर्शन ने कर दी है।

मानव जीवनीक्रम के संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन ने इस वस्तुगत सत्यता को उद्घाटित किया है कि मनुष्य के जितने भी संबंध एवं संपर्क हैं, उन सभी की परस्परता में स्थापित मूल्य हैं, जो स्थिति है। उसका यह उद्घोष राजनैतिक एवं धर्म नैतिक पक्षों एवं पक्षधरों का ध्यान आकर्षित करता है और मानवीयता की सीमा में “मानव जाति एक, कर्म अनेक” की सुदृढ़ स्थिति को पाने की संभावना प्रकट करता है एवं उसके लिए आवश्यकीय परिपूर्ण शिक्षा प्रदान करता है। मनुष्य में पाएजाने वाले चारों आयाम तथा मनुष्य की पाँचों स्थितियाँ (व्यक्ति, परिवार, समाज शासन एवं अंतर्राष्ट्र) के जीवनीक्रम में मध्यस्थ जीवनीक्रम की स्पष्टता को उद्घाटित करता है।

अब तक हम मनुष्य की परस्परता में स्थापित मूल्यों और उसकी स्थिरता के संबंध में एक रहस्यता अथवा वैविध्यता को अनिवार्य या अपरिहार्य सम्म समझते आये हैं, जिसका स्पष्ट प्रमाण यह है कि मानव जन अनेक जातियों में विघटित पाए जा रहे हैं, फलतः हम युद्धोन्मुखी हो गए हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र एवं देश युद्ध शक्ति का संचय करने में विवश हो गया है। इसका मूल कारण मनुष्य के परस्पर संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों की अशिष्टता ही है। सुदूर विगत के अथक प्रयासों की यह असफलता स्वयं में स्पष्ट है, जो अनेक खंडों में बंटी हुई है। इससे मुक्ति पाने के हेतु मध्यस्थ दर्शन सप्रमाण घोषणा करता है कि “मानव जाति एक कर्म अनेक”, “मानव धर्म एक मत अनेक”, “भूमि

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