एक राष्ट्र अनेक” तथा "ईश्वर एक देवता अनेक” है। इन मूल अवधारणाओं के सुदृढ़ आधार पर ही मानव अपने जीवन क्रम को स्वस्थ, समृद्ध और समाधानपूर्ण बना सकता है, जिसकी अनिवार्यता संभावना एवं प्रक्रिया को मध्यस्थ दर्शन व्यक्त करता है। खंड समाज में कभी भी अव्यवधानपूर्ण जीवनीक्रम को पाने की संभावना नहीं है। यद्यपि यह सर्वविदित तथ्य है ही, फिर भी दर्शन में इसके लिए समुचित पुष्टियाँ दी गई हैं। मध्यस्थ दर्शन ने जीवनी-क्रम के संदर्भ में मर्म स्थलों में छुपे हुए उस वस्तुगत सत्य को स्पष्ट किया है जो मानव मात्र के लिए साम्य रूप में प्रभावशील हैं और इस परिप्रेक्ष्य में जिस मूलभूत सिद्धांत को प्रस्थापित किया है वह है “मानव सही में एक गलती में अनेक है” यह समग्र मानव को सचेत करने वाला तथ्य है। हम हर समय एवं हर स्तर में देखते हैं कि गलती चाहे एक करे या सभी, सही प्रक्रिया से जो उपलब्धियां प्राप्त होनी हैं उसे प्राप्त करना संभव नहीं होता - जैसे एक गणित के प्रश्न को हल करने पर सही उत्तर एक ही होता है परंतु गलत उत्तर अनेक होते हैं। यह प्रत्यक्ष उदाहरण मानव जाति के वांछित तथ्य को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। मध्यस्थ दर्शन मनुष्य के जीवनी-क्रम के संदर्भ में विकास की ओर गतिशीलता को इंगित करता है तथा अमानवीयतापूर्ण जीवन से ग्रसित जन जाति को सह मानवीयतापूर्ण जीवनी-क्रम में अवस्थित करने के प्रस्ताव को भी प्रकट करता है। इसके लिए समुचित शिक्षा प्रणाली, नीति तथा असंदिग्ध विधि एवं व्यवस्था पद्धति का प्रस्ताव दर्शन में स्पष्ट रूप से है।
मध्यस्थ दर्शन ने अमानवीयतापूर्ण जीवन की सीमा में स्वस्थ सामाजिकता को असंभव बताया है। असामाजिकता स्वयं में ही अन्याय एवं गलतियों का परिणाम है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के अपने जीवनी-क्रम के संबंध में अशांत रहने, मानवीयता पूर्ण आचरण न करने, परिवार का सहयोग न पाने, समाज का प्रोत्साहन उपलब्ध न होने, शासन द्वारा संरक्षण एवं संवर्धन न पाने एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ के अनुकूल न रहने से ही मानवीयतापूर्ण जीवनी-क्रम की स्थापना एवं उसकी अक्षुण्णता बनाये रखना संभव नहीं हुआ है। अस्तु मध्यस्थ दर्शन ने मानवीयतापूर्ण सुदृढ़ आधार पर जिस जीवनी-क्रम को स्पष्ट किया है उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज राष्ट्र एवं अंतर्राष्ट्र के जीवन को स्वस्थ एवं समाधानपूर्ण बनाने के प्रयत्न करने होंगे – चाहे आज करें या भविष्य में।
मनुष्य अपने जीवन के कार्यक्रम को एक निश्चित रूप प्रदान करने हेतु न जाने कितने समय से प्रयासरत है परंतु वे सारे प्रयास अंततोगत्वा वैविध्यता की सीमा में ही सीमित रह गये जिसके कारण मनुष्य अनेक सीमाओं में खंड रूप में स्थित होकर अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए दूसरे मनुष्य के अस्तित्व को मिटाने के लिए कटिबद्ध हो गया है। इसी परंपरा में मनुष्य परस्पर द्रोह-विद्रोह एवं आतंक से ग्रस्त हो गये, जो प्रत्यक्ष है। इसके फलस्वरूप मनुष्य को परस्पर की वैषम्यता से दिशाहीनता ही हाथ लगी है तथा वह प्रत्येक स्तर पर संतृप्त हो गया है। यह कितने संताप की बात है कि सब में शुभकामनायें रहते हुए भी कार्यक्रम में शुभानुरूपी न होना उसके युद्धोन्मुखता का प्रधान कारण बन गया है। ऐसी विचित्र दशा में मानव जीवन के सही कार्यक्रम के संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन अपनी तात्विकता से पूर्ण व्यावहारिक एवं अनिवार्यतम पद्धति को नीतिवाद के रूप में प्रस्तुत करता है, जो मानव मात्र के लिए आवश्यक है।
मनुष्य के समग्र कार्यक्रम को सुनियोजित ढंग से तीन पद्धतियाँ (1) धर्मनैतिक (2) राजनैतिक तथा (3) अर्धनैतिक – में विभाजित करते हुए मध्यस्थ दर्शन यह प्रतिपादित करता है कि धर्मनीति और राजनीति अन्योन्याश्रित है। इस