ठोस वस्तुगत सत्य को उद्घाटित करते हुए यह बताता है कि एक से अधिक एकत्रित मनुष्य समूह ही समाज की संज्ञा पाता है तथा यहीं से वह आवश्यताओं को महसूस करने लगता है। आवश्यकताओं का महसूस होना ही प्रयोग व व्यवसाय हेतु प्रेरणा है जिसका फल अर्थोपार्जन में परिणीत है। अर्थोपार्जन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया ही है कि प्रत्येक इकाई- मनुष्य-प्राप्त अर्थ का सदुपयोग एवं उसकी सुरक्षा चाहता ही है। उस सदुपयोग एवं सुरक्षा के संबंधों में व्यक्तिगत सीमा में दिया गया निर्णय अंततोगत्वा वादग्रस्त हुआ जिसके फलस्वरूप युद्ध हुए। इनसे त्राण पाने के लिए अंत में मानव सिद्धांतों की शरण लेने को बाध्य व विवश हुआ। मध्यस्थ दर्शन ने सिद्धांतों के सार्वभौमिक होने का दावा किया है और स्पष्ट किया है कि मनुष्य को अपने वाद विवादों से मुक्ति पाने के लिए सिद्धांतों की शरण लेनी ही होगी। अभी तक जितने भी परिप्रेक्ष्यों में सिद्धांतों को प्राप्त कर अपना लिया गया है उनके प्रति कोई वाद विवाद दृष्टिगोचर नहीं हुआ है। इस प्रत्यक्ष उपलब्धि को देखते हुए हम अब आशा कर सकते हैं कि अन्य परिप्रेक्ष्यों में भी सिद्धांतों पर आधारित व्यवहारसुलभ प्रक्रियायें प्राप्त हो जाने पर मनुष्य के स्वस्थ एवं आश्वस्त होने की संभावना है।

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