2. मानव में सत्य की खोज क्यों?

23-4-1995, भिलाई

सत्य शब्द की गूँज अनादि काल से मानव सुनते आ रहा है। हर प्रकार के समुदाय में सत्य का नाम लेता हुआ मानव को पाते हैं। उल्लेखनीय बात यही है। आज भी सत्य, खोज की ही वस्तु बनकर रह गया है। दूसरा उल्लेखनीय तथ्य को बिना समझे, सत्य सहज महिमा के प्रति बहुत सारा कल्पनाओं को प्रस्तुत करते हैं। यह भी इस देश–धरती में देखने को मिलती है। सत्य सहज जितने भी कल्पनाएँ आज तक हुई हैं, उसके मूल में बाधा के रूप में, अपेक्षा के रूप में, कामना के रूप में विविध स्वीकृतियाँ यही हैं। सत्य एक बहुत बड़ी चीज है। सत्य की तुलना में उतनी बड़ी चीज़ और कुछ नहीं है। उसे पाकर हम सदा-सदा के लिए सुखी हो जाते हैं, ऐसी कामनायें हैं। 

मानव सहज रूप में ही सुखी होने का इच्छुक और प्रयासशील है ही। जितने भी प्रकार से मानव ने सुख के क्षणों को देखा है, दूसरे विधि से जिन क्षणों को मानव ने सुख के रूप में स्वीकारा, वह सदा ही क्षणिक रूप में होकर ओझल होता ही रहा है। इसे और स्पष्ट रूप में देखा जाए तो हमने मानव शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधेंद्रियों द्वारा अनुकूल परिस्थितियों में सुख के क्षणों और घटनाओं को स्वीकारा है वह ओझल होता ही रहा है। यह तो हर मानव अपने में प्रकारान्तर से देखता ही है और अधिकांश मनुष्य सत्यापित करता है। इसको आप हम सब जानते हैं। मानव ने सुख को तलाशने के क्रम में विचार, इच्छा, चिंतन, बोध विधियों से भी सुख और उसकी अक्षुण्णता को अपेक्षा के रूप में कई ग्रंथों में, दूसरी विधि से सभी प्रकार के धर्म ग्रंथों में अभ्यास परंपराओं ने उल्लेखित किया है। यथा योगाभ्यास, प्रार्थना, पूजा, यज्ञ, दान, तप सभी अभ्यासों से सुख और उसकी अक्षुण्णता को पाने का कार्य सदा- सदा ही किया है।

इन विधियों से सदा-सदा के लिए सुख पाया हुआ व्यक्ति प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं हो पाया, दूसरा सत्यापित नहीं हो पाया। इसी के पक्ष में यह भी मान्यता रही है - सत्य की खोज जो करता है, जब वह पा लेता है, उसके बाद गुड़ खाया हुआ गूंगा के रूप में अवाक हो जाता है ऐसा भी उल्लेख है। एक ही हाथी को कई अंधों ने उसके अंग-अवयवों को छूकर उसी आकार में सत्य को बताने की प्रक्रिया भी किया है, प्रयास भी किया है। इसीलिए किसी एक व्यक्ति के द्वारा उद्घाटित सत्यापित नहीं हो सकता। इन्हीं मानसिकता के साथ संतुष्टि लगाते लगाते सुदूर विगत से बार बार सत्य की खोज करने में प्रकृत होते हुए पीढ़ी से पीढ़ी गुजरता हुआ आया है। आज भी यह देखने को मिलता है कि बहुत सारा लोग, बहुत सारे प्रतिभाशाली लोग पहले कहे गए उपायों को अपनाते हुए सत्य की खोज करता हुआ दिखाई पड़ता है। वर्तमान में जो सत्य को खोजने के लिए उपायों को अपनाये हैं उनको कोई समुदाय या बहुत सरे लोग अपने ढंग से मूल्यांकन करते हैं। अधिकांश रूप में सम्मान भी करते हैं। ऐसी सम्मान ही मूलतः उपलब्धि का प्रमाण मानी गई है। चाहे सत्य खोजपूर्वक हाथ लग गया हो, न लग गया हो, इस बात का मूल्यांकन करना हर मनुष्य का पहुँच नहीं हो पाती है। इसलिए साधना करता हुआ आदमी को सम्मान करने वालों का तादात अथवा भीड़ के साथ ही किसी का मूल्यांकन होता है। 

यहाँ यह भी स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि केवल भीड़ को देख कर के प्रमाण मान लेना चाहिए या व्यक्ति के सत्यापन पर भरोसा कर जाँचना चाहिए? इस मुद्दे को संवाद रूप में देखने पर पता चलता है - सत्यापन के आधार

Page 18 of 106
14 15 16 17 18 19 20 21 22