पर जाँचना चाहिए। जांच में सकारात्मक बात निकलती है, उस स्थिति में हर व्यक्ति अभ्यासपूर्वक सत्य सहज सुख और उसकी अक्षुण्णता को पाना स्वाभाविक हो जाता है। इसी आशय से हर उपलब्धि सम्पन्न व्यक्ति को जाँचने की विधि बनती है। जैसा - कोई भी साधना करने से, यह जिज्ञासा करने का हर व्यक्ति को अधिकार है कि क्या आप सत्य को समझ गए हैं? यदि समझें हैं उस स्थिति में मुझे आप समझाएंगे क्या? मुझे समझाने में क्या-क्या शर्ते होंगी? इस प्रकार से हम शुरुआत कर सकते हैं। इस विधि से वास्तविक रूप से सत्य को समझ गए हैं, वे स्वयं सत्यापित करेंगे ही। जो सत्यापित करेंगे वे दूसरों को समझाने के लिए तत्पर रहेंगे। 

आगे हम अपने को सत्यापित कर रहे हैं कि हम जीवन विद्या परिवार में जितने भी प्रमाणित हो चुके हैं, सत्य को हम समझ चुके हैं और किसी को भी हम अध्ययन पूर्वक बोध करा सकते हैं। दूसरी विधि से हम समझ चुके हैं आपको समझा सकते हैं। मानव में समझदारी ही वस्तु है जो मानव में अक्षुण्ण रूप में रहता है। समझदारी केवल सत्य में, से, के लिए ही है। इसी स्वरूप में हम अस्तित्व रूपी परम सत्य को समझ चुके हैं। हमारे समझने का फल ही है- समझाने की आकांक्षा और प्रयास। इस प्रकार हम जीवन विद्या परिवार स्पष्ट रूप में समझा हुआ को समझाने और किया हुआ को कराने की विधि से सत्य का लोकव्यापीकरण कार्य में कटिबद्ध हैं। 

सत्य अपने स्वरूप में नित्य वर्तमान ही है इसे हम अस्तित्व कह रहे हैं। मानव से अतिरिक्त जीव प्रकृति, अन्न-वनस्पति और खनिज प्रकृति ये सब अस्तित्व में वैभवित हैं। यह धरती समग्र अस्तित्व के अंगभूत इकाई के रूप में है। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यही है - इस धरती में चारों अवस्था में ‘अस्तित्व’ ही प्रकाशमान है। मूलतः प्रकृति जड़-चैतन्य रूप में होना देखा गया है। जीवन को हम चैतन्य प्रकृति कह रहे हैं। रासायनिक-भौतिक सम्पूर्ण वस्तुओं को जड़ प्रकृति कह रहे हैं। इन्हीं रासायनिक भौतिक वस्तुओं से रचित प्रत्येक मनुष्य शरीर और जीव-शरीरों के रूप में दृष्टव्य है। जीवन ही समृद्ध मेधस सम्पन्न जीव शरीर और समृद्ध पूर्ण मेधस सम्पन्न मानव शरीर को संचालित करता है। आप हम आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता पूर्वक जो कुछ भी समझते हैं, सोचते हैं और करते हैं, ये सब जागृत जीवन का द्योतक है। जीवन जब तक भ्रमित रहेगा तब तक सत्य बोध और अनुभव से वंचित रहना पाया जाता है। जागृति का फलन ही है - सत्य सहज सत्य को समझने और उसको निरंतर उद्घाटित करने का कार्यक्रम। 

‘अस्तित्व’ सहज रूप में ही मानव को हृदयंगम होने की वस्तु है क्योंकि अस्तित्व में मानव अविभाज्य है। हर मनुष्य कम से कम स्वयं के अस्तित्व को स्वीकारता ही है। इसी आधार पर सम्पूर्ण ‘अस्तित्व’ को स्वीकारने योग्य योग्यतापर्यंत जागृति क्रम सूत्रित है। जागृति को प्रत्येक मनुष्य में होने वाले सत्य, जानने मानने पहचानने निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही हर व्यक्ति का स्वरूप है। इसी समझदारी के अधिकार से ही हर आयाम, कोण, दिशा परिप्रेक्ष्यों में अपने दायित्वों-कर्तव्यों को निर्वाह करना स्वयं स्फूर्त होता है। इसके प्रमाण में हर व्यक्ति स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। इस विधि से हम अनादिकाल से आंशित सार्वभौम व्यवस्था और अखंड समाज में हम मानव नियंत्रित संतुलित और सुरक्षित हो सकते हैं, इसकी अक्षुण्णता हो सकती है। 

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