3. बुद्धिजीवी  मानव  के  प्रति प्रार्थना

भूमिस्वर्गताम् यातु मनुष्यो यातु देवताम् ।

धर्मो सफलताम् यातु, नित्यं यातु शुभोदयम् ।।

'परमात्म-स्मरण'

सम्प्रति चतुर्दिक व्याप्त घोर आर्थिक संकट, खाद्यान्न की भीषण परिस्थिति एवं चारित्रिक दुर्बलता को देखकर आपको पत्र लिखने की मुझे प्रेरणा मिलती है।

देश की आर्थिक, नैतिक एवं वैज्ञानिक शक्ति का ह्रास एवं विकास शासन की नीति-भेद पर निर्भर करता है। शासन-नीति के विकासोन्मुख होने से ही वैयक्तिक एवं सामाजिक धीरता, वीरता एवं उदारता का बाहुल्य होता है, जिसके फलस्वरूप एक से अनेक तक स्वर्गीयता का अनुभव करते हैं। ऐसी अनुभूति की प्राप्ति के लिये शासन-नीति को चरित्र-बल एवं अध्ययन को प्राथमिकता देनी चाहिये। उसके विपरीत नीति का अनुसरण करने से वैयक्तिक एवं सामाजिक धीरता, वीरता एवं उदारता का ह्रास होना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए ऐसा देखने में आ रहा है कि शासन केवल बहुमत, जातिवाद एवं वर्गवाद के ही कारण सफल नहीं हो सका है। और देश में वैयक्तिक तथा सामाजिक स्तर पर अस्थिरता द्रुतगति से बढ़ती जा रही है। 

न्याय से पद, उदारता से धन, दया से बल, चरित्र से रुप, लक्ष्य से अध्ययन, निष्ठा से कर्त्तव्य, संतोष से तप तथा स्नेह से लोक का आचार करने से ही स्वर्गीयता का अनुभव सम्भव है, अन्यथा क्लेशोदय अनिवार्य है। 

नियम ही न्याय, न्याय ही विज्ञान, विज्ञान ही विधान, विधान ही शासन तथा शासन ही नियम है।

वैज्ञानिक विकास के लिये निष्ठापूर्वक बौद्धिक नियमों का पालन आवश्यक होता है। 

प्राकृतिक नियमों के पालन से ऋतु सन्तुलित होती है। 

कर्त्तव्य पूर्ण असंग्रह, प्रेम, निराभिमान, विकासोन्मुख शिक्षा और यथार्थ ज्ञान ही वह बौद्धिक नियम है, जिनसे वैज्ञानिक विकास होता है। 

पर-धन, पर-नारी एवं पर-पीड़ा से मुक्त व्यवहार ही वह मूल सांस्कृतिक नियम है, जिसके परिपालन से चरित्र की उपलब्धि होती है। 

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