प्राकृतिक सम्पत्ति का उत्पादन के अनुपात में ही व्यय तथा उनके उत्पादन में विघ्न न डालना ही प्राकृतिक नियम है, जिसके कार्यान्वयन से प्राकृतिक सन्तुलन रहता है और ऋतु सन्तुलित होकर उक्त मार्ग प्रशस्त करती है तथा प्राकृतिक कोप नष्ट हो जाते हैं। 

उपर्युक्त बताये अनुसार बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक नियमों के परिपालन से ही वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय जीवन में स्वर्गीयता का प्रादुर्भाव सम्भव है, ऐसा मेरा मत है। 

अवकाश से अधिक आवश्यकता एवं प्राप्त-पद के उत्तरदायित्व का तिरस्कार करने से उपरिवर्णित नियमों के उल्लंघन की प्रवृत्तियों का उदय होता है। जो क्रमश: परिवार, समाज तथा राष्ट्र-व्यापी बन कर क्लेश उत्पन्न करता है। आवश्यकता की पूर्ति कभी अभाव अत्याशा तथा अक्षमता के कारण नहीं हुई है।

व्यावहारिक पक्ष में नीतियों का निर्धारण निम्न आधार पर करने से सफल शासन की स्थापना एवं राष्ट्रीय समस्याओं का निराकरण सुलभ हो सकेगा, ऐसी मेरी सम्मति है, जो विचारार्थ प्रस्तुत है- 

राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का निर्धारण व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय नीति से समन्वित होना चाहिए। 

  • प्रत्येक प्रजा को उनके द्वारा वांछित अथवा शासन द्वारा निर्णीत कर्त्तव्य हेतु प्रवृत करने वाली नीति का कठोरता से पालन करना चाहिए।
  • अकर्मण्यता एवं आलस्य का दमन करना चाहिए, क्योंकि यह अप्रत्यक्ष रूप से एक राष्ट्रीय अपराध है। 
  • समस्त कार्यों एवं वस्तुओं का मूल्य राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित करना चाहिए, न कि प्रादेशिक स्तर पर तथा इसी नीति के आधार पर समस्त व्यवसायों, उद्योगों एवं वाणिज्य का एक-सूत्रीकरण किया जाना चाहिए। 
  • कार्यालयीन प्रकरणों के निराकरण की अवधि निर्धारित कर देनी चाहिए और निर्धारित समय के भीतर सम्पन्न न किये जाने वाले कार्यों के लिये तत्सम्बन्धी शासनाधिकारियों को कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए। 
  • जिस अधिकारी की चरित्रहीनता उसके वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा प्रतिपादित की जा चुकी हो, उसके अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के चरित्र के प्रति निर्णय निर्णय देने के अधिकार का समपहरण कर लिया जाना चाहिए।
  • शासकीय व्यवस्था में योग्यता को प्राथमिकता देने वाली नीति का अनुसरण करने से युक्त-पद समुदाय व्यवस्था का जन्म होगा। 
  • न्यायपूर्ण सुझावों का सम्मान करने वाली नीति अपनाने से समाजवाद की स्थापना शीघ्रतापूर्वक की जा सकेगी। 
  • ऐसी शिक्षा-पद्धति का आविष्कार किया जाना चाहिए, जिससे छात्रों में कृतज्ञता की भावना जागृत हो और उन्हें मानवोचित लक्ष्यों एवं कर्त्तव्यों का समुचित बोध हो। केवल ऐसी वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति से ही राष्ट्र का उत्थान हो सकता है।
  • निरपराध को अपराधी और अपराधी को निरपराध सिद्ध करने वाले वर्तमान न्याय-शास्त्र एवं न्यायशास्त्रियों को निरस्त करने वाली नीति से युक्त, न्याय-पद्धति का विकास करना चाहिये। 
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