4. परिवार मानव: एक आवश्यकता (क्र.१)
22-4-1995
भिलाई
हम सदा-सदा से परिवार का नाम लेते ही हैं। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि परिवार में सदा-सदा के लिए पूर्णतया समाधान, समृद्धि, परस्पर विश्वासपूर्वक सहअस्तित्व सहज रूप में जीने का स्वरूप अपेक्षित रहते हुए प्रमाणित नहीं हो पाया है, यही पीड़ा है। इसका कारण मानवीयतापूर्ण आचरण और इसके मूल में जीवन ज्ञान एवं अस्तित्व दर्शन सहज जागृति मानव परंपरा में स्थापित नहीं हुआ है। यही मुख्य बिन्दु है। हर व्यक्ति समाधान, समृद्धि सहज अपेक्षारत रहता है - परंपरा जागृति और जागृति का प्रमाण प्रस्तुत करने में अपने को असमर्थ पाते ही आया है। परंपरा जागृत होने के उपरांत ही हर मनुष्य जागृत होने की संभावना और प्रक्रिया समीचीन होना पाया जाता है। परंपरा जागृत होने का तात्पर्य मानवीयतापूर्ण शिक्षा, मानवीयतापूर्ण संविधान और मानवीयतापूर्ण व्यवस्था ही है।
मानवीयतापूर्ण शिक्षा व अध्ययन क्रम में ही प्रत्येक मानव ‘स्वायत्त मानव’ होना पाया जाता है। ऐसा स्वायत्त मानव ही ‘परिवार मानव’ के रूप में प्रमाणित होना स्वाभाविक है। ‘स्वायत्त मानव’ अपने में ‘जीवन -ज्ञान’ रूपी परम ज्ञान ‘अस्तित्व दर्शन’ रूपी परम दर्शन और ‘मानवीयतापूर्ण आचरण’ रूपी परम आचरण सम्पन्न रहना पाया जाता है, फलस्वरूप स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबन होना पाया जाता है। ऐसे ‘स्वायत्त मानव’ का वैभव छोटे से छोटे और बड़े से बड़े परिवार में प्रमाणित होता है। जैसे परिवार, परिवार समूह, ग्राम परिवार क्रम से विश्व परिवार। सभी स्तरीय परिवार में मनुष्य का ही वैभव प्रमाणित होता है। मानव का सार्वभौम वैभव ‘सम्यक-त्रय’ संपन्नता ही है। इसे सर्वसुलभ करना ही अथवा लोकव्यापीकरण करना ही मानवीय शिक्षा संस्कार का स्वरूप है। इसी क्रम में अर्थात् ऐसे शिक्षा - संस्कार क्रम में ही परिवार मानव प्रतिष्ठा प्रमाणित होता है।
हर परिवार मानव स्वायत्त रहने के आधार पर ही स्वानुशासित होने का मार्ग प्रशस्त होता है। यही जागृति का प्रमाण है। स्वानुशासन अपने में जागृतिपूर्वक स्वयं-स्फूर्त कार्यकलाप है। मानव सहज सम्पूर्ण कार्यकलाप व्यवस्था सहज वर्तमान और समग्र व्यवस्था में भागीदारी ही है। व्यवस्था अपने में मानवीयतापूर्ण परिवार ही है। ऐसे प्रत्येक परिवार सहअस्तित्व में जीना सहज है। यही सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र रूप है। इसकी व्याख्या मानवीयतापूर्ण परंपरा और उसका लोकव्यापीकरण ही है।
सर्वमानव स्वाभाविक रूप में ही अथवा अनजाने में भी शुभ को चाहता है क्योंकि अभी तक सर्वशुभ घटित तो नहीं हुई है, इसके उपरांत भी सर्वाधिक मनुष्य समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व रूपी सर्वशुभ को चाहता ही है। ऐसा चाहने के क्रम में विविध प्रकार से प्रयास करना भी विविध समुदाय के रूप में दिखता है। ये सभी प्रयास, अनेकानेक रूप में इस धरती पर इसी वर्तमान में विद्यमान हैं। इसे धर्मगद्दियों, राजगद्दियों, व्यापार गद्दिओं, शिक्षा गद्दियों के रूप में और अनेकानेक समाजसेवी संस्थाओं के रूप में भी देखा जा सकता है। ये सभी अपने अपने में सर्वशुभ के दावेदार हैं। सर्वशुभ तो बहुत दूर रहा, विरोधाभास सदा-सदा ही प्रज्ज्वलित होता आया। विरोधाभास का