पक्षधर स्वयं विरोधों को शाब्दिक, वाचिक विधि से स्वीकारता नहीं है। अर्थात् विरोधाभास का पक्षधर कोई भी अपने को विरोधी घोषित नहीं करता। ऐसा कोई घोषित करता है उसे उग्रवादी - असामाजिक कहा जाता है। ऐसा घोषणा करने वाला जब इन गद्दिओं में अथवा संस्थाओं में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उनको सर्वशुभ चाहने वाला मान लिया जाता है। इसी कारणवश सामरस्यतापूर्ण परिवार अर्थात् समाधान और समृद्धिपूर्ण परिवार, ग्राम, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण राष्ट्र अपने को प्रमाणित करने में आज भी पर्याप्त नहीं हो पाए हैं क्योंकि एक इकाई समाधान और समृद्धिपूर्ण होने का प्रमाण अनेक रूप में परिणित होना ही है। जैसा - एक परिवार समाधान और समृद्धिपूर्ण होने पर अनेक परिवार का समाधान और समृद्धपूर्ण होना एक आवश्यकता बन ही जाती है। इसके पहले एक परिवार समाधान समृद्धि सम्पन्न होने का प्रयास सहज है। इस प्रयास में हम सफल हो गए हैं। इसलिए हम सभी को परिवार-मानव रूप में देखने की चाहत सहित प्रस्तुत है।
हर परिवार में पाया जाने वाला हर प्रौढ़ व्यक्ति अपने परिवार में विरोध न हो, विद्रोह न हो, आतंक न हो, अन्याय न हो, ये सब कामना के रूप में स्वीकारा रहता है। दूसरे विधि से समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सम्पन्न होने की चाहत बना ही रहता है। उल्लेखनीय तथ्य यही है हर परिवार इसके विपरीत यंत्रणाओं को भोगते हुए, देखते हुए ही परिवार रूप में होना पाया जाता है और इसका समाधान उनके पास न होने के फलस्वरूप आशय के अनुरूप स्वयं को नियोजित नहीं कर पाता है। दूसरे विधि से सर्वशुभ रूपी आशयों को सफल बनाने के लिए स्वयं से कोई योजना-उपाय निष्पन्न नहीं हो पाता है। इसी निरीहतावश और विभिन्नतावश बहुमुखी प्रताड़नाओं का भाजक हो जाता है। यही प्रत्येक मनुष्य में विफलता का कारक तत्व है। इसका उपाय केवल परिवार मानव विधि ही है । ऐसे परिवार मानव प्रतिष्ठा के लिए स्वायत्त मानव विधि को अपनाना अनिवार्य है। स्वायत्त मानव विधि सूत्र केवल सम्यकतात्रय में जागृति ही है। ऐसे जागृति कार्यक्रम के लिए हम जीवन विद्या कार्यक्रम और शिक्षा का मानवीयकरण कार्यक्रम को सम्पन्न कर रहे हैं। इसमें जितने भी पारंगत होते हैं वे सब स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होते हैं। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर हम विश्वास करते हैं कि इसका लोकव्यापीकरण होगा ही क्योंकि सर्व मानव में सर्वशुभ की अपेक्षा बनी हुई है। इस विधि से इसकी सफलता का मार्ग निर्विदाद है।
हर मनुष्य हर अवस्था में कार्य करते हुए सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण में प्रमाणित होना सहज है। क्योंकि हजारों वर्षों से गलती करते हुए भी एक दिन सही करने का स्थान व संभावना समीचीन रहता ही है। इसी विधि से कितने ही युगों से मनुष्य सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण का प्यासा व जिज्ञासु है। जीवन ज्ञान रूपी सम्यक ज्ञान, अस्तित्व दर्शन रूपी सम्यक दर्शन और मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी सम्यक आचरण सबकी आवश्यकता है। इसी क्रम से प्रकारांतर से हर मनुष्य जिज्ञासु है।
जीवन ज्ञान प्रत्येक मनुष्य में होने वाली आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता सहज अध्ययन है। इसी के साथ जीवन सहज रूप में सम्पन्न होने वाला आस्वादन-चयन, तुलन-विश्लेषण, चिंतन-चित्रण, बोध-प्रज्ञा, अनुभव व अभिव्यक्ति का अध्ययन है। इसमें जीवन का मूलरूप, रचना, प्रक्रिया, विकास और जागृति का सम्पूर्ण अध्ययन समायी हुई है। इसे क्रम से हम आपके सम्मुख अध्ययन के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करते रहेंगे। इस अंक में केवल सम्यक आचरण का स्वरूप प्रस्तुत है। यथा- सम्यक आचरण का तात्पर्य सार्वभौम रूप में मानव में, से, के लिए स्वीकृति सहित आचरण ही है।