मानवीयतापूर्ण आचरण में मूल्य, चरित्र और नैतिकता अविभाज्य रूप में पूरक विधि से वर्तमानित रहता है। पूरकता का तात्पर्य चरित्र के साथ मूल्य, नैतिकता के साथ चरित्र अविभाज्य रूप में, अक्षुण्ण रूप में रहना पाया जाता है। हर मनुष्य संबंधों के साथ ही मूल्यों को प्रमाणित करता है। जैसे - कृतज्ञता, गौरव, श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान और स्नेह। इनमें से विश्वास सभी संबंधों में सार्थक होता है। इसके मूल में संबंधों को पहचानना ही निर्वाह करने का आधार रहता है। निर्वाह करने के क्रम में उन उन संबंधों में विश्वास होना स्वाभाविक क्रिया है। ऐसा प्रमाण स्वायत्त मानव सहज स्वयं के प्रति विश्वास ही हर संबंधों में प्रवाहित होना देखा गया है। संबंधों को पहचानने के क्रम में उसकी आवश्यकता और प्रयोजन सहज स्वीकृति जागृत व्यक्ति में होता ही है। इसी क्रम में हर व्यक्ति परिवार के हर सदस्य का संबंध, उसके प्रयोजन के संबंध में जागृत रहता है। अतएव निर्वाह हो पाता है। निर्वाह होने के हर प्रक्रिया के मूल्यांकन में उभय संतुष्टि होती ही है। इस प्रकार संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह पूर्वक किये मूल्यांकन और उभयतृप्ति है। 

चरित्र का स्वरूप स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में देखा गया है। ऐसा चरित्र हर मानव में, से, के लिए स्वीकार्य है। स्वधन का तात्पर्य प्रतिफल, पारितोषिक और पुरस्कार के रूप में प्राप्त वस्तुएं हैं। स्वनारी/स्वपुरुष का तात्पर्य लोक विदित है। विवाह संबंध पूर्वक प्राप्त दाम्पत्य संबंध इसकी सफलता, संतुलन, व्यवस्था के रूप में जीने, व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने के रूप में देखा गया है। ऐसे कार्य और उसकी निरन्तरता के लिए प्रतिज्ञित होना ही प्रधानतः विवाह संबंध है। संबंध का तात्पर्य भी पूर्णता के अर्थ में अनुबंधित रहने से है। दयापूर्ण कार्य व्यवहार का तात्पर्य जीने देकर जीना है। हर जागृत अभिभावक अपने संतानों को जीने देकर ही जीना चाहते हैं। इस प्रकार सार्वभौम रूप में मानवीयतापूर्ण चरित्र अभिहित होता है। 

नैतिकता की भाषा हम सुनते ही हैं। नैतिकता का अर्थ ही होता है नियति क्रम में गति। नियति के स्वरूप को विकास, जागृतिक्रम और जागृति के रूप में देखा गया है। जागृति में, से, के लिए तन, मन, धन रूपी अर्थ को नियोजित कर सदुपयोग को प्रमाणित करना और जिसके लिए नियोजित किए उसकी सुरक्षा होना नैतिकता का स्वरूप है। इसी को दूसरे शब्दों से तन,मन,धन रूपी अर्थ का सदुपयोगात्मक नीति ही धर्मनीति है और निश्चित वस्तु व व्यक्ति का सुरक्षात्मक नीति ही राज्यनीति है। 

जय हो ! मंगल हो !! कल्याण हो !!!

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