राज्य गद्दी में बैठे उन्हें, उनको ताकने वाले, देखने वाले, सुनने वाले किसी को राज्य मिला हो ऐसा प्रमाण न मिल पाना ही उल्लेखनीय घटना है। 

धर्म गद्दी में आसीन किसी व्यक्ति को धर्म मिल गया हो, इसका प्रमाण अभी तक किसी देशकाल में मिल नहीं पाई। इसके बावजूद भी इन दोनों प्रकार की गद्दियाँ, सम्मान, गौरव, अभिवादन, समर्पण पाता हुआ देखने को मिलता है। इस विधि से हम इस निष्कर्ष पर आए हैं कि इसका विकल्प नियतिक्रम में अर्थात् विकास और जागृति क्रम में एक अनिवार्य स्थिति बन चुकी है। क्योंकि विज्ञान ने सभी प्रकार के देश-काल संबंधी दूरी को घटा दिया है। इसका श्रेय तकनीकी में पारंगत व्यक्तियों को जाता है। 

हम यह भी देख पा रहे हैं कि धर्मगद्दी और राज्यगद्दी की असफलता को स्वीकारे हुए बुद्धिजीवियों की बहुत बड़ी भारी संख्या इस धरती पर है। इनसे गठित संगठनों को विशेषकर समाजसेवी संस्थाओं के नाम से माना जाता है, सुना जाता है। इन समाजसेवी संगठनों से जुड़े व्यक्तियों का भी मानना है कि राज्य और धर्म की हमारी कोई अपेक्षा नहीं है, हम समाजसेवी हैं। यहाँ उल्लेखनीय भ्रम यही है कि शासन विरोधी कार्य के बिना शासन नहीं सुधर सकती। इसी प्रकार अंधविश्वास रूपी धर्मतंत्र को विरोध किए बिना धर्म सुधर नहीं सकता। इसीलिए इनके विरोध के लिए संघर्ष करना आवश्यक है। बुद्धिजीवियों को ऐसा वक्तव्य देते सुना गया है, देखा गया है। यह एक विचारणीय विडंबना है। 

ऊपर कहे हुए गतिविधियों को ध्यान में लाने पर इतना ही पर्याप्त है कि समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व सर्वसुलभ होने के लिए उचित योजना, उसके लिए समुचित नियंत्रण, नियामन, निश्चयन विधि तथा विज्ञान और विवेक विचार शैली की आवश्यकता है ही। इसके मूल में यथार्थता, वास्तविकता और सत्यता को इंगित होने और इंगित करने योग्य सहअस्तित्व सूत्रों को पहचानना अनिवार्य है। 

हम इस तथ्य का अनुभव करते हैं स्वायत्त मानव परिवार मानव के रूप में और परिवार मानव ग्राम स्वराज्य के रूप में प्रमाणित होना सहज है। इन कार्यों में हम प्रयासोन्मुखी हैं। इनमें से स्वायत्त मानव के रूप में स्वीकृतियों और निष्ठाओं को जीवन विद्या परिवार में पहचाना जा सकता है। इतना ही नहीं जीवन विद्या प्रतिष्ठान के द्वारा संचालित शिक्षा का मानवीयकरण कार्यक्रम और उपक्रम सहित विद्यार्थियों में पाई जाने वाली गुणवत्ता, व्यावहारिकता, अध्ययन और अवधारणाओं में दक्षता के रूप में देख सकते हैं। 

इन विधियों पर विश्वास करते हैं, निष्ठा करते हैं कि सर्वशुभ रूपी समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व, सर्वदेश काल में सर्वसुलभ होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवसाय में स्वावलंबन तथा व्यवहार में सामाजिक होना अपरिहार्य है। यही स्वायत्त मानव का स्वरूप है। 

स्वायत्त मानव ही एक से अधिक मिलकर परिवार मानव के रूप में प्रमाणित हो पाते हैं। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यही है कि स्वायत्त मानव बनने के लिए सहज उपाय (सबको सुलभ होने वाला उपाय) केवल जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन और मानवीयतापूर्ण आचरण ही है। यही सहअस्तित्व विधि विचार संपूर्तित-आपूर्तित करता है। संपूर्ति का तात्पर्य सम्पूर्ण प्रकार से पूर्ति होने से है और आपूर्ति का तात्पर्य आवश्यकतानुसार पूर्ति होने से है। इस विचार से अर्थात्

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