5. परिवार मानव: एक आवश्यकता (क्र.२)

          मार्च-अप्रैल 1995 

हम मानव एक दूसरे के विचारों को सुनना चाहते हैं। हर बोलने-सुनने अथवा पढ़ने-सुनने के साथ-साथ कुछ स्थायित्व की ओर इच्छाएँ दौड़ते हैं। जैसे :- 

हम समाधान की ओर चर्चा छेड़ते हैं, उसके स्पष्ट रूप को सार्वभौमता के रूप में समझना चाहते हैं, स्वीकारना चाहते हैं। 

  • हम समृद्धि की बात एक दूसरे से करते हैं, सबके लिए समृद्धि कैसे हो सर्वाधिक लोगों में कल्पना के रूप में दौड़ती है।
  • अभयता की बात करते हैं, उसमें भी अभयशीलता सब को प्राप्त हो सकता है, सोचते हैं। इसी प्रकार
  •  सहअस्तित्व का संवाद भी सबके लिए, सबके साथ कैसे सार्थक हो, इस ओर मनुष्य की कल्पनाएँ दौड़ लगाता हुआ, कई संवादों में हम देखे। इसमें उल्लेखनीय वस्तु यही है हर व्यक्ति अपने में इन चारों उपलब्धियों को पाने की स्थली में स्वीकारता है। साथ ही अधिकांश मनुष्य प्रकारांतर से, यह सबको मिलने वाला नहीं है, ऐसा सोचकर चुप हो जाते हैं। उसके फलस्वरूप व्यक्तिवादी विधि से इन सभी को संजोने में अपने ही तरीके से तुल जाते हैं। 
  • हम जीवन विद्या परिवार इस बात को देख चुके हैं कि अभी तक भय, प्रलोभन और आस्था के आधार पर आधारित सभी प्रयास असफल हो चुका है। इसलिए इसी की पैरवी करने वाले आशा, विचार, इच्छाएँ उक्त उपलब्धियों के सार्वभौमता को सबको मिलने की आवश्यकताओं, संभावनाओं पर शंका करता ही आया है। यहाँ उल्लेखनीय बात यही है हर व्यक्ति समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व को अपनी निजी आवश्यकता और संभावना स्वीकारते हुए “सबकी आवश्यकता है” इस तथ्य पर शंका कर देते हैं। इसका मूल कारण भय प्रलोभन आस्थानुसार जो लाभोन्मादी, भोगोन्मादी और कामोन्मादी शिक्षा प्रचार तंत्र से प्रभावित रहना पाया जाता है। यह निष्कर्ष इस बात का द्योतक है कि सर्वस्वीकृत उन्मादत्रय की निरर्थकता, भय प्रलोभन की स्वीकृत निरर्थकता और आस्थावादी विधाओं में मिलने वाला सम्मान प्रधान कारण रहा है। 

आस्था केंद्र को राजतन्त्र और धर्मतंत्र को सुदूर विगत से माना गया है, क्योंकि आस्थाओं का मूल स्वरूप, रचना, गति और गंतव्य किसी भी देश काल में, किसी भी समूह में लोक गम्य नहीं हो पाया। इतना ही नहीं आस्थाओं के पीछे असंख्य व्यक्ति समर्पित होते हुए भी समुदाय परंपरा में भी प्रमाण सिद्ध नहीं हो पाई। यह तो सबको विदित है ही कि हर समुदाय किसी न किसी धर्म तंत्रित आस्थाओं से जूझता ही आया। 

राजतन्त्र का मूल रूप भी किसी विद्वान-मूर्ख, ज्ञानी-अज्ञानी, धनी-निर्धनी, बली-दुर्बली को प्रमाण रूप में करतलगत नहीं हुई। यदि किसी व्यक्ति को हुआ हो, वह परंपरा में ख्यात नहीं है। इसका तात्पर्य यही हुआ जितने भी

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