मध्यस्थ दर्शन

1. मध्यस्थ दर्शन (क्र.१)

मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) के प्रचार प्रसार के क्रम में :-

“निम्न बिन्दुयें अस्तित्व में मानव जीवन के नित्य वैभव को स्पष्टतया पहचानने के लिए विचारणीय हैं।”

1. अस्तित्व कैसा है? का समाधान क्या होगा?

जबकि आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार अस्तित्व को चेतना मात्र कहा गया है और पदार्थ को चेतन से निष्पन्न हुआ समझ गया है। जबकि भौतिकवादी विचारधारा के अनुसार अस्तित्व को पदार्थ मात्र ही समझा गया और चेतना को पदार्थ के विकास की परिणति कही गई और जबकि मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्व विचारधारानुसार सत्ता अर्थात् अरुपात्मक अर्थात् चेतना में संपृक्त नित्य सामरस्य रत प्रकृति अर्थात् रूपात्मक अर्थात् पदार्थ को अस्तित्व समग्र प्रतिपादित किया। 

2. अस्तित्व में विकास होता है या नहीं, यदि होता है तब विकास किसका एवं उसका स्वरूप क्या? 

जबकि आदर्शवादी विचारधारा विकास को नकार दिया एवं भौतिकवादी विचार विकास को स्वीकारते हुए मात्रा रचना और साधन मूलक या आनुषांगिक कहा। जबकि मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववादी विचारधारा प्रकृति के मूल इकाई परमाणु में विकास होने के तथ्य को प्रतिपादित किया और उसके स्वरूप को पूर्णतात्रय – गठन, क्रिया एवं आचरणपूर्णता स्पष्ट करते हुए उसके निरन्तरता को अध्ययन सुलभ किया है। 


मूलतः विचार धारा क्या होनी चाहिये?

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद या समाधानात्मक भौतिकवाद 

संघर्षात्मक जनवाद या व्यवहारात्मक जनवाद 

रहस्यात्मक अध्यात्मवाद या अनुभवात्मक अध्यात्मवाद 

क्योंकि “विचारधाराएं अवधारणाओं का स्त्रोत हैं”

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