2. मध्यस्थ दर्शन (क्र.२)

प्रस्तुत योजना का स्रोत मध्यस्य दर्शन (सहअस्तित्ववाद) है जो सार्वभौम मानवीय संविधान, शिक्षा, स्वराज्य व्यवस्था को प्रतिपादित करता है। 

मध्यस्थ दर्शन रहस्य से मुक्त है। यह मनुष्य के सम्पूर्ण आयामों की यथार्थता, वास्तविकता और सत्यता को अध्ययनगम्य और बोधगम्य कराता है। मध्यस्य दर्शन अनुभव बल की अभिव्यक्ति, सर्वतोमुखी समाधान की सम्प्रेषणा, न्यायपूर्ण व्यवहार, नियमपूर्ण व्यवसाय व आचरणपूर्ण पद्धति से जीने की कला को करतलगत कराता है। साथ ही साधार उपायों द्वारा योजनाबद्ध पद्धति से मनुष्य की परस्परता में भौतिक समृद्धि, बौद्धिक समाधान, अभयता (मानव में निहित समस्त भयों से मुक्ति) व सहअस्तित्व को सहज सुलभ कराता है।

मध्यस्थ दर्शन के अनुसार अस्तित्व में प्रत्येक इकाई समग्रता के साथ भागीदारी का निर्वाह करते हुए अग्रिम विकास के सूत्र से सूत्रित है। इस तथ्य को जानने मानने पहचानने एवं निर्वाह करने के क्रम में मानव स्वयं एक व्यवस्था है व समग्र व्यवस्था के साथ भागीदार है। अस्तित्व ही सम्पूर्ण भाव है। अस्तित्व में मानव ही सभी भावों का दृष्टा है। भाव की अपेक्षा में ही अभाव होता है। अभाव की समझ मानव में जन्म से रहती है। अभाव की समझ ही अव्यवस्था की समझ है जो दुख का कारण है। सभी भावों की समझ ही जीवन जागृति है। यही अस्तित्व में व्यवस्था की समझ है। जो अनुभव में प्रामाणिकता व विचार में समाधान है। सम्पूर्ण समाधान में मानव तथा नैसर्गिक सम्बन्धों की पहचान और उनमें निहित मूल्यों का निर्वाह सहज रूप में होता है। 

जीवन विद्या का आधार

मध्यस्थ दर्शन निम्न पाँच भागों में है। 

मध्यस्य दर्शन 

मानव व्यवहार दर्शन 

  • मानव कर्म दर्शन 
  • मानव अभ्यास दर्शन 
  • मानव अनुभव दर्शन 
  • मानव व्यवसाय दर्शन 
  • जिसमें समग्र अस्तित्व अर्थात् अस्तित्व ही सह‌अस्तित्व, अस्तित्व में विकास, विकास क्रम में जीवन व जीवन जागृति तथा अस्तित्व में भौतिक रासायनिक रचना व विरचना का निर्भ्रम अध्ययन समाविष्ट है। 
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