3. मध्यस्थ दर्शन (क्र.३)

दिनांक 20-3-84

दिव्य पथ संस्थान, अमरकंटक

जिला - शहडोल (म. प्र.)

“अभय, समाधान, समृद्धि एवं सहअस्तिवपूर्वक ही अखण्ड राष्ट्रीयता सुलभ होगी।”

ऐसी व्यवहारिक उपलब्धि के लिये सामाजिक (धार्मिक), आर्थिक एवं राज्यनैतिक स्वतंत्रता तथा समन्वयता अपरिहार्य है, जिसके लिये मानवमूल्य मानव चरित्र एवं मानवतावादी नीति का निश्चयीकरण तथा निर्धारण आवश्यक है। मानव जीवन का तात्विक एवं व्यावहारिक अध्ययन ऐसी नीति को सर्वसुलभ बनाने के लिये आवश्यक है। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण लगता है कि मानव का कार्यकलाप केवल उसके शरीर की तुष्टि एवं पुष्टि के लिये ही नहीं है अपितु सर्वक्रियाकलाप से वह बौद्धिक समाधान भी चाहता है। 

बौद्धिक समाधान के लिये भौतिक एवं बौद्धिक क्षेत्र के क्रियाकलापों का मूल्यांकन एवं उनकी वरीयता का निर्धारण तथा अनुशासनक्रम का निर्धारण आवश्यक प्रतीत होता है। इसके लिये दिव्य पथ संस्थान अमरकंटक के तत्वावधान में दिनांक 9-6-84 से 11-6-84 तक एक संगोष्ठी का आयोजन अमरकंटक जिला शहडोल (म.प्र.) में किया गया है जिसमें संलग्न पत्र के अनुसार बिन्दुओं पर चर्चा प्रस्तावित है| 

आशा है मानव में निहित अमानवीयता के भय के उन्मूलन तथा मानवीयतापूर्ण सामाजिकता की स्थापना का कार्यक्रम निश्चित तथा क्रियान्वित करने की दिशा निर्धारण के लिये आपका सहयोग हमें अवश्य ही प्राप्त होगा। 

चिंतन, परिचर्चा एवं संगोष्ठी

विचार बिन्दु :-

(1) विश्वशान्ति की अनिवार्य आवश्यकतायें:- 

(अ) द्वन्दात्मक भौतिकवाद के स्थान पर समाधानात्मक भौतिकवाद, संघर्षात्मक जनवाद के स्थान पर व्यवहारात्मक जनवाद, रहस्यात्मक अध्यात्मवाद के स्थान पर अनुभवात्मक अध्यात्मवाद की स्थापना।  

(ब) आर्थिक राज्यनीति एवं धार्मिक (साम्प्रदायिक) राज्यनीति के स्थान पर सामाजिक-आर्थिक राज्यनीति की स्थापना

(2) वर्तमान में उपलब्ध समस्त "मत-सिद्धान्त एवं वाद" का सार्वभौम सिद्ध न होना - संस्कृति, सभ्यता विधि एवं व्यवस्था के सभी रूपों में व्याप्त विसंगति - अतएव विकल्प की आवश्यकता।

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