दर्शन परिचय:-
दर्शन स्थिति मूलक समग्रता की व्याख्या करते हुये अरुपात्मक अस्तित्व को सत्ता एवं रूपात्मक अस्तित्व को प्रकृति की संज्ञा देते हुए, सत्ता को पूर्ण व्यापक एवं प्रकृति को अनन्त क्रियाशील निरूपित करते हुए समग्र अस्तित्व को सत्ता में संपृक्त प्रकृति और स्थिति को सहअस्तित्व प्रतिपादित करता है। फलस्वरूप जगत मिथ्या की अतिवादिता एवं जगत सर्वस्व की अतिवादिता को नकारते हुये प्रकृति को विकास क्रम में गठनपूर्णतापूर्वक चैतन्य पद में होने की सत्यता को एवं उसके अनन्तर गुणात्मक विकासपूर्वक क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता होने की वास्तविकता को कारण, गुण, गणित द्वारा स्पष्ट कर अध्ययन सुलभ किया है। पूर्णतात्रय की स्थिति में प्रकृति के चैतन्य पद अर्थात जीवन का अस्तित्व सहित मुक्त होना नियति है, को प्रयोगपूर्वक, व्यवहार पूर्वक एवं अनुभवपूर्वक प्रमाणित किया है। विकास क्रम में प्रकृति की ज्ञानावस्था को मनुष्य की संज्ञा दी गई है। इसमें मनुष्य को परिभाषित कर मनुष्य के जीवन, जीवनीक्रम, जीवन के कार्यक्रम एवं उद्देश्य को स्पष्ट करते हुये सुखधर्मी सिद्ध क्रिया है। इसी क्रम में मनुष्य का स्वभाव दृष्टि एवं विषय को ध्यान में रखते हुये, पशु मनुष्य, राक्षस मनुष्य, मनुष्य, देव मनुष्य एवं दिव्य मनुष्य की कोटि में वर्गीकृत किया जो मनुष्य के संक्रमणपूर्वक विभिन्न विकसित स्थिति को स्पष्ट करता है।
विकास की स्थिति जो पूर्णतया नियमबद्ध होकर व्यवस्थित है को प्रतिपादित करते हुये पूर्व मान्यतायें अधिदैविक, दैविक एवं अधिभौतिक जो रहस्यात्मक अध्यात्मवाद संघर्षात्मक जनवाद एवं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के रूप में जो ख्यात हुआ उसे नकारते हुये अनुभवात्मक अध्यात्मवाद व्यवहारात्मक जनवाद एवं समाधानात्मक भौतिकवाद को स्थापित करता है। जिसके अन्तर्गत मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की सामरस्यता उपलब्ध है। मध्यस्थ दर्शन मनुष्य की मौलिकता को स्पष्ट करते हुये उनमें अधिक उत्पादन एवं कम उपभोग योग्य क्षमता तथा कर्म करते समय स्वतंत्र एवं फल भोगते समय परतंत्रता को स्पष्ट करते हुये अर्थ जो तन मन एवं धन के रुप में है का सम्पत्तिकरण के स्थान पर साधनीकरण तथा उसकी सदुपयोगिता एवं सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन देता है। उसके सदुपयोगात्मक नीति को धर्मनीति और सुरक्षात्मक नीति को राज्यनीति होने की सत्यता को स्पष्ट किया है। इस तरह यह दर्शन प्रत्येक प्रयोजन के मूल सें मनुष्य को स्थापित कर धार्मिक, आर्थिक राज्यनीति की सफलता की घोषणा करता है। दर्शनानुसार मनुष्य संस्कारपूर्वक अभ्युदयशील है। यह मनुष्य को प्रत्येक अतिवादिता से मुक्त कर सत्य को स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य एवं वस्तुस्थिति सत्य के सम्मिलित स्वरूप की निर्भ्रम जानकारी प्राप्त करने की योग्यता प्रदान करता है। फलतः मनुष्य निर्भ्रम होकर मानवीय गुणों से सम्पन्न, प्रबल संस्कारों सहित दिव्यता में अवस्थित होने की अवश्यमेव सम्भावनाओं को पूर्ण प्रामाणिकता के साथ घोषणा करता है।
दिव्य पथ संस्थान का यह विश्वास है कि प्रस्तुत मध्यस्थ दर्शन एक निर्विवाद व्यवस्था को प्रदान करने में पूर्णत: सक्षम है। जनसमुदाय इसे अध्ययन कर अपनी संदिग्धता को दूर करने में सक्षम हो सकेगा। संस्थान दर्शन संबंधी प्रत्येक प्रश्न के समाधान सत्यता एवं व्यावहारिक सफलता को सैद्धांतिक एवं प्रयोग रूप में प्रस्तुत करने के लिये कटिबद्ध है। अत: इस युगीन उपलब्धि को सर्वसुलभ बनाने की दिशा में आप सभी प्रबुद्ध मनीषियों की निष्ठापूर्ण सहयोग की अपेक्षा है।