(3) मध्यस्थ दर्शन: - एकमेव सार्वभौम विकल्प - समीक्षा एवं विवेचन-यथा: -
(अ) मानव एवं मानव मूल्यों की पहचान
(ब) मानवीय मूल्यों को पहचानने के क्रम में स्थिति मीमांसा
(स) स्थिति मीमांसा के क्रम में सहअस्तित्व एवं सहअस्तित्व के क्रम में रूपात्मक तथा गुणात्मक विकास एवं विकास के क्रम में जीवनपद
(द) जीवन के गुणात्मक विकास के क्रम में मानवपद (ज्ञानावस्था)
(य) मानव पद में गुणात्मक विकास के फलस्वरूप सुलभ होने वाले जीवनमूल्य समाजमूल्य और वस्तुमूल्य पर आधारित मानवचरित्र एवं नैतिकता की प्रस्थापना|
(र) संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था में मानव मूल्य और मूल्यांकन संस्कार पद्धति, न्याय सुलभता एवं विनिमय सुलभतावादी शिक्षा की प्रस्थापना।
संस्थान का परिचय इस प्रकार है-
संस्थान दिव्य पथ संस्थान के नाम रूप से प्रतिष्ठित है। जिसका विधिवत म.प्र. सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 के अन्तर्गत 16 मार्च 1981 को पंजीयन हुआ है। यह वर्तमान में निष्ठावान बुद्धिजीवी सदस्यों का संगठन है। अधिकांश सदस्य स्वाध्यायी हैं। संस्था का प्रमुख कार्यालय अमरकंटक जिला शहडोल में है। सदस्यता के लिये मात्र स्वप्रेरित व्यक्तियों का स्वागत है। संस्थान का उद्देश्य परमपूज्य श्री ए नागराज शर्मा द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन जो मानव व्यवहार, कर्म, अभ्यास एवं अनुभव दर्शन के रूप में व्याख्यायित है, का जन समुदाय में प्रचार एवं प्रसार करना है, जिसमें मानव व्यवहार दर्शन पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुका है।
सदस्यों का उद्देश्य प्रधानत: अध्ययन एवं अध्ययनारूप व्यवहार एवं अभ्यास करना है। जिससे "भविष्य को विषम बनाने में अपना सहयोग नहीं है", को प्रतिपादित कर स्वयं में आश्वस्त होना और अन्यों को प्रेरित करना है।
दर्शन प्रणेता का परिचय:-
दर्शन प्रणेता परम पूज्य श्री ए नागराज शर्मा का जन्म 14 जनवरी 1920 को अग्रहार ग्राम, तहसील अरकलगुड, जिला हासन प्रान्त कर्नाटक में हुआ। उन्होंने कालीदास रचित सुप्रसिद्ध काव्य "मेघदूत" को कन्नड़ भाषा में भाषान्तरण किया। साथ ही वैदिक चिंतन को आत्मसात् कर "विचार विमर्श" नामक ग्रन्थ की रचना की। जीवन मूलक अध्ययन एवं सत्यान्वेषण के प्रयास के क्रम में सन् 1950 से अमरकंटक में अपने परिवार सहित कृषि एवं आयुर्वेदिक चिकित्सा को जीविकोपार्जन का माध्यम बनाकर साधनारत रहे।