यहां संस्कृति का स्मरण आवश्यक इसलिये रहा कि लाभालाभ विचार दृष्टि की क्रियाशीलता मनुष्य अथवा मानव के चरित्र में ही देखने को मिलता है इसी क्रम में ऊपर कहे हुए तथ्यों के आधार पर उत्पादन मनुष्येतर प्रकृति के साथ होता है यह असंदिग्ध रूप में समझ चुके हैं। मनुष्य के साथ मनुष्य व्यापारिक, व्यावहारिक संबंधों को देख पाता है। व्यापार में ही लाभालाभ की बात सन्निहित है। मनुष्य मनुष्य के साथ व्यापार करने लगता है अथवा लगा है तब से ही लाभ की दृष्टि वर्तमान होती आयी है इसका साक्ष्य यही है लाभोन्मादी अर्थ चिंतन। प्रत्येक व्यक्ति संस्था और व्यवस्था जो वस्तु जितनी कीमत में लिया रहता है उससे अधिक में बेचने के लिये बाध्य हो गया है। इसकी सफलता के मूल में मांग को अधिक बनाये रखना और वस्तु को कम दिखाना यह व्यापार का मर्म माना गया है। अर्थशास्त्र में भी इस प्रकार का उल्लेख मिलती है कि आवश्यकताएं अनंत हैं वस्तुएँ सीमित हैं इसलिये लाभदायी पद्धति से अर्थव्यवस्था को सोचना चाहिए। इन बातों को देखने पर अपने को स्वयंस्फूर्त प्रेरणा इस ओर देखने के लिये बाध्य करता है कि व्यापार से मनुष्य लाभमूलक पद्धति से समृद्ध होना चाहिए या व्यवसाय मूलक पद्धति से या अधिकाधिक उत्पादन से समृद्ध होना चाहिए? इसके व्यावहारिक विश्लेषण पर जाते हैं तब हम पाते हैं कि वस्तु ही हमारी समृद्ध है न कि धन।
धन में वस्तु को खरीदने की शक्ति को मानकर चलते आये यह देखने को मिला कि एक समय में उतने ही पैसों से जिस वस्तु का जितनी मात्रा से खरीद पाता था वह दूसरे समय में देखने को नहीं मिला जैसे इस शताब्दी के प्रथम दशक में जिन वस्तु का एक मूल्य रहा हो वह सैकड़ों गुना बढ़ चुका है। इससे एक तथ्य उभरता है। एक क्रम चलते-चलते एक दिन बहुत सारा पैसा ही वस्तु के रूप में रह जाएगा और पैसे से वस्तुएं मिल पाएंगी या नहीं शंकास्पद स्थिति निर्मित होती है। इस ढंग से वस्तु से समृद्ध होने के तथ्य को स्वीकारने पर क्या स्थिति बनेगी उसके बारे में मानव कुल सोच पायेगा, समझ पाये और कुछ कर पायेगा। यह स्पष्ट हो चुका है कि उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच में एक व्यापार कार्य है। उसी में लामोन्माद की निरंतर वृद्धि होती आई। इसे लाभोन्माद कह सकते है। इसे दूसरी भाषा में शोषण कार्य भी कह सकते हैं। यह विनिमय नहीं हुआ। विनिमय आवश्यक है, व्यापार आवश्यक नहीं। मनुष्य ही मनुष्य के व्यापार का लक्ष्य बन जाता है। फलतः यथार्थता से भिन्न दोहरे व्यक्तित्व के व्यापारी तैयार करना पड़ता है।
इस प्रकार से दोहरे व्यक्तित्व के कारण व्यापार हुआ। ऐसी व्यापारवादी व्यवस्था दोहरे व्यक्तित्व का शिकार होना स्वाभाविक हुआ। व्यापार एवं व्यवस्था जब दोहरे व्यक्तित्व का भागीदार हुआ तब लोक जीवन में दोहरा व्यक्तित्व ही स्वाभाविक हुआ, फलत: शिक्षा भी उसी के तारतम्य में होता आया। इस प्रकार मनुष्य लाभ के प्रलोभन से उबरने का रास्ता नहीं पाया। इसका गवाही यही है कि पूंजीवादी साम्यवादी एवं दोनों से मिला वादी लाभोन्मादी कार्य चिंतन ही प्रभावशील है इसका तात्पर्य यह हुआ कि अर्थमूलक शिक्षा व्यवस्था एवं चरित्र हुआ।
मनुष्य में वस्तु और मूल्यों को पहचानने की क्षमता संचेतना के रूप में समाहित रहती है जबकि अर्थ वस्तु मूल्य का प्रतिमूल्य के अर्थ में है ऐसी प्रतीक मूल्य से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था और चरित्र कैसे एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, मनुष्य स्वयं ही किस प्रकार से संतुष्टि पाये? इन दो बिन्दुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी के साथ इसी से यदि संतुष्ट हो सकते हैं तो कैसे? यदि नहीं हो सकते तो विकल्प क्या होगा? इसे स्पष्टतया हृदयंगम करना ही मध्यस्थ दर्शन का एक उद्देश्य है।