• जागृतिपूर्वक अभिव्यक्त होना। 

 जागृति के आधार पर ही मनुष्य दिव्य मानव, देव मानव, मानव, राक्षस मानव, पशु मानव के रूप में प्रकाशित होना पाया जाता है जिसका स्पष्ट अध्ययन 

  • मानवीयता का स्वभाव, विषय, विषय प्रवृत्ति और दृष्टियों का क्रियाशीलता इसी प्रकार 
  • देवमानव का स्वभाव, विषय, प्रवृत्ति और दृष्टियों की क्रियाशीलता 
  • दिव्य मानव का स्वभाव, विषय और दृष्टियों की क्रियाशीलता. 
  • अमानवीयता का स्वभाव, विषय, प्रवृत्ति, दृष्टियों की क्रियाशीलता 

अध्याय-3

मानवीयता ही मानवीय शिक्षा, संस्कार, राज्य धर्म व्यवस्था का आधार यही शिक्षा के मानवीयकरण का अर्थ भी है। 

मानवीयकरण होने का प्रयोजन स्वराज्य व्यवस्था में मानवीय शिक्षा संस्कार, न्याय सुरक्षा, उत्पादन कार्य, विनिमय कोष, स्वास्थ्य संयम अविभाज्य रूप में वर्तमान होता है उसकी निरंतर गति मानवीयता के आधार पर अर्थात् मानवीयता को असंदिग्ध रूप में जानने, पहचानने, मानने, निर्वाह करने के रूप में सहज सुलभ हो पाता है। जीवन तृप्ति स्वतंत्रता के रूप में स्वानुशासन के अर्थ में सार्थक होता है जिसका नामकरण स्वतंत्रता है। इसी प्रकार जीवन विद्या का फलन स्वतंत्रता और स्वराज्य है। 

अध्याय-4 

जीवन जागृति क्रम में अस्तित्व, अस्तित्व में विकास। 

जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक भौतिक रचना और विरचना का जानने, मानने की सहज विधियाँ। 

अस्तित्व में जीवन का उद्देश्य विकास का उद्देश्य का अध्ययन सुलभ होना। अस्तित्व में मनुष्य दृष्टा पद प्रतिष्ठा में परंपरा के रूप में नित्य वर्तमान होना।

अध्याय - 5 

मानवीयतापूर्वक गुणात्मक विकास के क्रम में पूरकता प्रणाली पद्धति तथा तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा रूपी नीतिपूर्वक नीति संपन्न जीने की कला उसका नित्य उत्सव है। 

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