जिससे ही सौन्दर्य बोध और सौंदर्य, सौंदर्य और सुख, सौंदर्य और समाधान का नित्य संबंध, वर्तमानित होता है।
मूल्यमूलक - लक्ष्यमूलक प्रणाली से मानवीयता का संरक्षण, संवर्धन एवं नित्य उत्सव मानव परंपरा में सफल होता है।
प्रत्येक मनुष्य व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाथ में स्वावलंबी, बौद्धिक रूप में समाधानित, नित्य सहअस्तित्व में वर्तमान होने के रूप में स्वयं का एवं व्यवस्था का अध्ययन सहज है।
अध्याय - 7
जीवन का मूल रूप, जीवन का कार्य रूप, जीवन का तत्व रूप में उद्देश्य समायी हुई है जो स्वयं समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व ही है। जीवन के उद्देश्यानुसार व्यवहृत होने के क्रम में जीवन जागृति की व्यवस्था और उसकी अपरिहार्यता स्पष्ट होता है। जिसे जीवन के कार्य रूप और महिमा रूप में पूर्ण विश्वास और निष्ठा के रूप में प्रमाणित किया जाता है अथवा प्रमाणित होता है।
मनुष्य ही जीवन जागृति को प्रमाणित करता है। जिसकी पुष्टि का आधार प्रत्येक मनुष्य में पायी जाने वाली कर्म स्वतंत्रता और कल्पनाशीलता है। वह (मनुष्य) जन्म से न्याय का याचक, सही करने का इच्छुक, सत्यवक्ता होने का सहज प्रकाशन और प्रत्येक मनुष्य का "मनाकार को साकार करने वाला मन: स्वस्थता का आशावादी उसका होना" वर्तमान होना प्रमाणित है।
मनुष्येतर प्रकृति में भी पहचानना निर्वाह करना, की क्रिया स्पष्ट है, व जानना मानना का प्रमाण केवल मनुष्य में वर्तमान है। जानने मानने की संपूर्ण वस्तु अस्तित्व विकास, जीवन जागृति, रासायनिक भौतिक रचना विरचना रूपी परिणाम है। पहचानने निर्वाह करने की संपूर्ण वस्तु मानव सम्बन्ध, नैसर्गिक संबंध और उनमें निहित मूल्य है।
परिष्कृतिपूर्ण मानव संचेतना, उसकी निरंतरता रूपी परंपरा, मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा है।
परिष्कृतिपूर्ण मानव संचेतना का स्वरूप : - 3 जो समीचीन है