7. जीवन विद्या (क्र. ७)

दिनांक - २४ /०५ /१९९५ 

*नागराजजी से सुने हुए का श्रोता द्वारा प्रतिलेखन

मूल मुद्दा अध्ययन के लिए :- 

सहअस्तित्ववाद दर्शन का सैद्धांतिक पक्ष - अस्तित्व की धारणा 

  • विशेष रूप से न्याय और धर्म की तो सामाजिक उपयोगिता समझ में आती है , लेकिन न्याय, धर्म और सत्य का जुड़ाव या यों कहें कि सत्य या अस्तित्व की अवधारणा की आवश्यकता के बारे में संतुष्टि नहीं है। जब समाधान धर्म में पूरा हो जाता है - जो कि सुख के लिए काफी है तो सत्य कि क्या आवश्यकता है ?
  • (श्री नागराज जी के साथ हुए अध्ययन का सारांश निम्नलिखित है - करीब चार दिन की बातचीत में अलग अलग विषयों पर बाबाजी ने प्रकाश डाला। उनका संग्रह करके मुख्य बिंदुओं के रूप में नीचे प्रस्तुत किया है। चूँकि सारे विषय एक दूसरे से जुड़े हैं इसीलिए वही विषय बातचीत के दौरान कई बार आए लेकिन नीचे इन्हें अलग-अलग बिंदुओं में रखा गया है यह सिर्फ सुविधा के लिए हैं।)

अस्तित्व :- 

अस्तित्व में निश्चयता एवं स्थिरता है, ये न घटता है न बढ़ता है। अस्तित्व के दो अंग रूपात्मक तथा अरुपात्मक भी अपने में अविभाज्य हैं। दो इकाइयों के बीच में सत्ता है। प्रकृति सत्ता में डूबी हुई है तथा ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ सत्ता नहीं - सत्ता व्यापक है। इकाई के सभी ओर सत्ता दिखती है। इकाई का सत्ता में डूबे रहने, घिरे रहने व भीगे रहने के कारण उसमें क्रियाशीलता, नियंत्रण, बल संपन्नता होती है। सत्ता को ऊर्जा भी माना गया है तथा सत्ता में संपृक्त प्रकृति ऊर्जामय है। ऊर्जामयता के कारण ही बल संपन्नता है।

ऊर्जामयता →बल संपन्नता →भार (सिर्फ जड़ में ) → चुंबकीय गुण → एकदूसरे के साथ सहअस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। इस प्रकार अस्तित्व ही सहअस्तित्व है का सूत्र पता लगता है। सहअस्तित्व का सूत्र है कि प्रत्येक वस्तु त्व सहित (रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहित) व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करता है। एक इकाई दुसरे इकाई को पहचानने की व्यवस्था का नाम प्रकाशन है। हर वस्तु अनंत कोणों में प्रतिबिम्बन सहित रहती है - इसी का नाम है प्रकाशमानता। प्रत्येक छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी वस्तु अपने से प्रकाशमान है। इसकी गवाही उनका प्रतिबिम्बन है। ऊर्जा संपन्नता, बल संपन्नता, क्रियाशीलता के कारण ही प्रकाशमानता है। प्रतिबिम्ब में ऊर्जा का आदान-प्रदान नहीं होता इसीलिए प्रकाश में कोई दबाव या तरंग नहीं होती न ही उसमें कोई गति होती है। 

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