ऊर्जामयता के कारण ही प्रत्येक वस्तु स्वयं स्फूर्त रूप से क्रियाशील है। सत्ता पारगामी होने के कारण ऊर्जामयता है। अरुपात्मक अस्तित्व या सत्ता तो व्यापक है और रूपात्मक अस्तित्व जिसमें जड़ तथा चैतन्य इकाइयां हैं, अनंत है ।

परमाणु :- 

व्यवस्था का आधार परमाणु ही होता है। निश्चित आचरण का प्रमाण परमाणु में ही होता है न कि परमाणु अंश में। Quantum Mechanics के अनुसार परमाणु अंश में अनिश्चितता है। निश्चित आचरण परमाणुओं द्वारा संरचित अणुओं का भी आचरण निश्चित होता है। परमाणु दो प्रकार के होते है - जड़ तथा चैतन्य। जड़ परमाणु रासायनिक भौतिक रचना विरचना में भाग लेते है। चैतन्य परमाणु ही जीवन है। निश्चित आचरण के रूप में परमाणु तथा परमाणु अंश में साथ रहने की प्रवृत्ति है। यही व्यवस्था का आधार है। यह तात्विक रूप में अनुस्यूत रूप में पाया जाता है। रूप, गुण, स्वभाव तथा धर्म में परमाणु अंश सभी एक ही प्रकार के होते हैं। जड़ परमाणु में एक से अधिक परमाणु अंश मध्य में रहते हैं तथा उतनी ही संख्या में परमाणु अंश परिवेश (orbit) में रहते हैं। मध्य में एक से अधिक अंश के कारण ही जड़ परमाणु में भार होता है। भार बंधन के कारण ही अणुबंधन होता है। विकास के क्रम में जब जड़ परमाणु के मध्य में सिर्फ एक अंश रह जाता है तो वह गठन पूर्ण होकर चैतन्य परमाणु बन जाता है तथा यह परमाणु भार विहीन एवं अणुबंधन से मुक्त हो जाता है ।

प्रकृति में दो प्रकार के जड़ परमाणु हैं - भूखे और अजीर्ण परमाणु। भूखे परमाणुओं में अपनी आवश्यकता से कम परमाणु अंश रहते हैं तथा अजीर्ण में अपनी आवश्यकता से अधिक परमाणु अंश। इन्हीं परमाणु अंशों के आदान - प्रदान से अणुबंधन होता है। परमाणुओं में श्रम, गति, परिणाम के रूप में अनुस्यूत क्रिया दिखती है। परमाणु तथा परमाणु अंशों की सत्ता में संपृक्त रहने के कारण ही परमाणु में क्रियाशीलता रहती है। इसी क्रियाशीलता या बल संपन्नता को परमाणु श्रम, गति व परिणाम के रूप में व्यक्त करता है। परमाणु में दो प्रकार की गतियाँ होती है, वर्तुलात्मक तथा कंपनात्मक। स्वभाव गति रहेगी तो परमाणु व्यवस्था में काम करेगा। आवेशित गति होने पर अव्यवस्था उत्पन्न होगी। 

हर क्रिया श्रम, गति, परिणाम के रूप में व्याख्यायित होती है। श्रम तथा गति का संयोग नए परिणाम के रूप में होता है। परिणाम में श्रम के संयोग से गति उत्पन्न होती है। परिणाम और गति के संयोग में श्रम का मूल्यांकन होता है। जड़ परमाणु के गठन पूर्ण होकर चैतन्य पद में प्रवेश करने पर परिणाम का अमरत्व हो जाता है। कंपनात्मक गति बढ़कर मनोगति के समान हो जाती है। गठनपूर्ण होने पर परमाणु अंशों का परमाणु में से आवागमन बंद हो जाता है तथा गठन पूर्ण परमाणु के परिवेश में कुल साठ अंश (चार परिवेशों में 2, 8, 18, 32 क्रमशः) अंश होते हैं और मध्य में एक अंश ।

इस आधार पर भूखे जड़ परमाणुओं की संख्या 60 तथा अजीर्ण परमाणुओं की संख्या 60 है। कुछ जड़ परमाणुओं की अधिकतम संख्या 120 है।

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