सम्पूर्ण प्रकृति चार अवस्थाओं मे अभिव्यक्त है। जड़ परमाणुओं में भार बंधन के कारण अणुबंधन होता है। अणुबंधन से ही रचना विरचना होती है। भौतिक वस्तुएं ठोस तथा विरल रूप में पाई जाती हैं। ठोस पदार्थ ही कोशिका के रूप में रचित होते हैं। ब्रह्माण्डीय किरणों के आधार पर संयोग वियोग से रासायनिक वस्तुएं तरल रूप में दिखाई पड़ती हैं। रासायनिक द्रव्यों की उपस्थिति में तथा ऊष्मा के दबाव में कोशिका में अनुकूल परिस्थितियों में प्राण संप्रेषित होता है। रचना में अनुसंधान विधि होती है। नई रचनाएँ पुरानी रचनाओं से बनती हैं। एक प्रजाति दूसरी प्रजाति में या एक जाति में दूसरी जाति में अवतरित होने की व्यवस्था प्रकृति में है। यह अनुसंधान प्रवृत्ति (प्राणसूत्र रचनासूत्र में) Chromosomes में होती है। जब अपनी प्रजाति धरती पर तृप्त हो जाती है तो अनुसंधान द्वारा दूसरी प्रजाति का संक्रमण होता है। किसी दूसरी प्रजाति के अवतरित होने के पहले प्रकृति में अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
इस समय धरती पर प्रकृति चार अवस्थाओं - पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था तथा ज्ञानावस्था में अभिव्यक्त है, पदार्थावस्था में निष्प्राण इकाइयाँ नियमपूर्वक हैं। नियम तथा नियंत्रणपूर्वक प्राणावस्था है। नियम, नियंत्रण, संतुलन सहित समाधान ज्ञानावस्था की मौलिकता है। नियंत्रण में नियम, संतुलन में नियम और नियंत्रण तथा न्याय में नियम, नियंत्रण एवं संतुलन समाहित है। पदार्थावस्था तथा प्राणावस्था में जड़ प्रकृति है तथा जीवावस्था व ज्ञानावस्था में जड़ एवं चैतन्य दोनों प्रकृतियाँ हैं। परिणामानुषंगी विधि पदार्थावस्था में मौलिकता है, वंशानुषंगी विधि जीवावस्था में मौलिकता है और संस्करानुषंगी विधि ज्ञानावस्था में मौलिकता है। प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था सभी प्राण कोशिकाओं द्वारा रचित हैं। पदार्थ में ब्रह्माण्डीय नियंत्रण होता है तथा वनस्पतियों में नैसर्गिक नियंत्रण। जीव संसार में जीवन में आशाबंधन क्रियाशील रहता है। यह आशा सिर्फ जीवित रहने की होती है। शरीर ही जीने की स्थली है ऐसा भ्रम रहता है। इसीलिए इंद्रिय संरचना के अनुसार जीवन स्वयं नियंत्रित हो जाता है। सारा कार्य इंद्रिय सन्निकर्ष होता है। कुछ जीवों में विचार बंधन भी देखने को मिलता है
मनुष्य के जीवन में आशा विचार तथा इच्छा बंधन रहता है। इसी आधार पर जीवन शरीर को चलाता है। जीवन ही मनुष्य को जीवंत रखता है। शरीर में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय तथा एक विकसित मेधस रचना होती है। जीवन मेधस पर अपने संकेतों को प्रसारित करके ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को संचालित करता है। मेधस की रचना पूर्ण होने के साथ गर्भ में ही जीवन शरीर को संचालित करना शुरू कर देता है। शरीर यात्रा पूरी होने पर जीवन सत्ता में चैतन्य परमाणु के रूप में विद्यमान रहता है। जीवन कार्य गति पथ सहित अपने में एक पुंजाकार है। वह एक आकार है। उस आकार की शरीर रचना वंशानुषंगी विधि से उपलब्ध रहती है। भोग इच्छा के अनुसार जीव या मनुष्य शरीर का चयन होता है। जीव संसार में इंद्रिय सन्निकर्षातमक अपनी प्रजाति में संघर्ष होता है। ऐसा संतुलन के अंतर्गत होता है। वंशानुषंगी विधि में अपने त्व सहित व्यवस्था बनाए रखने का नाम ही संतुलन है। वनस्पति संसार में वृक्ष से बीज तथा बीज से वृक्ष ही आवर्तनशीलता का नाम ही नियंत्रण है। ज्ञानावस्था में मनुष्य के साथ न्याय तथा मनुष्येतर प्रकृति के साथ नियम के आधार पर समाधान एवं संस्कारानुषंगी विधि में व्यवस्था है।