करती है। जीवन जागृति को प्रमाणित करने की विधि ही व्यवस्था है। तथा अनुभव का स्त्रोत ही ज्ञान है। अस्तित्व सहज विधि से जीने के लिए अस्तित्व दर्शन की आवश्यकता है। अस्तित्व का प्रयोजन जागृति है। मनुष्य का प्रयोजन समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व तथा जीवन का प्रयोजन आत्मा का आनंद, बुद्धि में संतोष, चित्त में शांति और वृत्ति में सुख है। जागृतिपूर्णता के उपरांत जीवन मुक्त पद में सुख, शांति, संतोष, आनंद को प्राप्त कर ब्रह्माण्ड में विचरण करता है। जागृति के लिए परंपरा का सहारा चाहिए अध्ययन के रूप में। अध्ययन में न्याय, धर्म, सत्य का बोध हो जाना चाहिए। जीवन प्रकाश में अस्तित्व प्रतिबिंबित रहता है। इसका बोध अध्ययन द्वारा होता है।
न्याय का बोध होने पर हम संबंधों को पहचान कर मूल्यों का निर्वाह करते हैं। चिंतनपूर्वक मूल्यांकन द्वारा उभय तृप्ति मिलती है। यह तृप्ति मन विचार का सुख और उसकी निरंतता का स्वरूप बनती है। धर्म का बोध होने पर सहअस्तित्व में सर्वतोमुखी समाधान दिखता है। फलस्वरूप व्यवस्था और समाधान चिंतन में आता है। धर्म के बोध से वृति चित्त के अनुरूप होती है। इसके बाद अस्तित्व के रूप में सत्य चिंतन में आता है तथा चित्त एवं बुद्धि तृप्त होती है। बोध की तृप्ति होती है। अनुभवमूलक विधि से सत्य की प्रमाणित करने पर बुद्धि एवं आत्मा तृप्त हो जाती है। सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व जो जीवन पर प्रतिबिंबित है को जब जीवन अभिव्यक्त करता है तो उसे अनुभव व प्रामाणिकता कहते हैं। चयन, आस्वादन, तुलन, विश्लेषण एवं चित्रण क्रियाओं को पहचानना एवं निर्वाह करना संवेदनशीलता कहलाता है। चिंतन, बोध, संकल्प, अनुभव तथा प्रामाणिकता की क्रियाओं को जानना एवं मानना संज्ञानशीलता कहा गया है। यही मानव संचेतना का पूर्ण स्वरूप है।