मनुष्येतर प्रकृति व्यवस्था में स्थापित है। मनुष्य अपनी संस्कारानुषंगी विधि को न स्वीकार करने के कारण वंशानुषंगी विधि से जीता हुआ अतृप्त रहा है। लेकिन हर मनुष्य व्यवस्था में जीना चाहता है, इसीलिए उसे जीवन जागृति की आवश्यकता है।
शरीर की रचना विशेषता के कारण मनुष्य को कर्मस्वतंत्रता एवं कल्पनाशीलता प्राप्त है इसीलिए अभी तक शरीर व्यवस्था के आधार पर जीवन में व्यवस्था तथा क्रियाएं नहीं पहचानी गई हैं। अभी तक मनुष्य आशा विचार तथा इच्छा शक्तियों के बंधन में जी रहा है और चयन, आस्वादन, तुलन (प्रिय, हित, लाभ के आधार पर) विश्लेषण तथा चित्रण क्रियाओं में कार्य करता है। आशा, विचार तथा इच्छा बंधन के अनुसार जो कल्पनाएँ चित्रण में आई उन्हें मनाकर से साकार करने में उसे तृप्ति नहीं मिल रही। इस बंधन के आधार पर उसे सुविधा और संग्रह की संस्कृति मिली जिनका कोई तृप्ति बिन्दु नहीं है। अस्तित्व में अध्ययन विधि से मनुष्य को जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन तथा मानवीयतापूर्ण आचरण के माध्यम से जागृति की व्यवस्था है। शोध विधि (वर्तमान के पीछे का सूत्र) से मनुष्य को जीवन ज्ञान और अस्तित्व दर्शन तथा अनुसंधान (आगे के सूत्र) से मानवीयतापूर्ण आचरण प्राप्त हुआ है। जागृति की यह विधि मानव केंद्रित अस्तित्वमूलक चिंतन पर आधारित है जबकि पिछली रहस्यमूलक अध्यात्मवादी विधियाँ और अनिश्चयता तथा अस्थिरतामूलक भौतिकतावादी विधियाँ असफल रही हैं। ज्ञानावस्था का प्रयोजन ही है जीवन द्वारा अपनी समझदारी अनुरूप शरीर को चलाते हुए जागृति को प्रमाणित करना।
अभी तक प्रिय, हित, लाभ में जीता हुआ मनुष्य भय, प्रलोभन, आस्था के आधार पर व्यवस्था खोज रहा है। धर्म और राज्यगद्दी दोनों ने ही मनुष्य को भ्रमित किया है तथा भय, प्रलोभन और आस्था में ही जीने को मज़बूर किया है। जरूरत है आस्था को स्वयं में विश्वास में बदलने की। स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक तथा व्यवसाय में स्वावलंबी स्वायत्त मानव परिवार में प्रमाणित होता हुआ समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व को प्राप्त कर परिवारमूलक स्वराज्य का आधार बनेगा तथा अपेक्षित तृप्ति को प्राप्त करेगा। यह कार्यक्रम चिंतन द्वारा न्याय के माध्यम से ही सफल होगा। न्याय का मतलब है संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन तथा उभय तृप्ति।
अभी तक हम भाषा को ही ज्ञान मानते आयें हैं बिना वस्तु को समझे। जीवन विद्या में वस्तु की समझ मुख्य है और यही ज्ञान है। समझने की वस्तु अस्तित्व है तथा अस्तित्व ही सहअस्तित्व है सब को पहचानकर निर्वाह करने की आवश्यकता है। अस्तित्व दर्शन ही परम दर्शन है तथा जीवन ज्ञान ही परम ज्ञान।
परमाणु का चैतन्य पद में आते ही परिणाम का अमरत्व हो जाता है। इसके पश्चात् श्रम और गति एक दूसरे को समर्पित रहते हुए जागृति के लिए प्रयासरत रहते हैं। बोधपूर्वक चिंतन द्वारा संबंधों में मूल्यों का निर्वाह होने पर मानव अपने मानवत्व सहित व्यवस्था में जीता है तथा समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करता है। यह समाधान और उसकी निरन्तरता ही श्रम के विश्राम की स्थली है। गति अनुभव और उसकी प्रमाणिकता में अपने गंतव्य को प्राप्त