8. जीवन विद्या (क्र. ८)
दिनांक 28-2-89
अस्तित्व में जीवन विद्या और जीवन केन्द्रित जागृति लक्षित अभ्यास की परिस्थिति, स्थिति व गति आवश्यकता संभावना, स्रोत, प्रक्रिया एवं प्रयोजन
अस्तित्व में जीवन-जागृति लक्षित अभ्यास के लिए अनुकूल परिस्थिति -
विभिन्न अभ्यास परम्पराओं में अंतर्विरोध होना।
- अनुभव बल, विचार-शैली एवं जीने की कला में अंतर्विरोध होना।
- ध्यान, ध्येय व ध्याता में अंतर्विरोध होना।
- दृष्टा, द्रष्य व दर्शन में अंतर्विरोध होना।
- अभ्यास, अभ्यास का परिणाम, फल एवं प्रभाव का शिक्षा व व्यवस्था से सूत्रित, व्याख्यायित न हो पाना।
- ये सभी परिस्थितियां विकल्प के लिए प्रेरक हैं, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य कर्म स्वतंत्र एवं कल्पनाशील है।
“मानव संस्कार बीजानुशंगीय परंपरा है”
अस्तित्व में जीवन विद्या प्रत्येक मनुष्य में, से, के लिये सहज स्थिति व गति है।
जीवन विद्या = जीवन जागृति = अस्तित्व में अनुभूति = प्रखर प्रज्ञा = प्रामाणिकता = जानना+मानना स्थिति = समाधान = सम्बन्धों को पहचानना+निर्वाह करना = गति।
प्रामाणिकता (जानने व मानने) में, से, के लिये सम्पूर्ण वस्तु :-
अस्तित्व
- अस्तित्व में विकास
- अस्तित्व में जीवन
- अस्तित्व में जीवन-जागृति
- अस्तित्व में रचनाएँ
- प्रत्येक मनुष्य कर्म स्वतन्त्रता व कल्पनाशीलता जैसी मौलिक वैभव सहित स्थिति व गति में दृष्टव्य है। यही मौलिकता बहुआयामों में प्रवर्तन का स्रोत होना, सर्वेक्षण पूर्वक सम्पूर्ण देश काल में स्पष्ट होता है। बहुआयामी प्रवर्तन क्रम में कर्म व कल्पना की तृप्ति बिन्दु का तलाश समाहित है।