भाग – 3
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जिज्ञासा: अगला बिंदु इसमें प्रमाण का है। तीन प्रकार के प्रमाणों की बात की है, अनुभव, व्यवहार और प्रयोग। आगे लिखा है बाबा, अनुभव ही प्रमाण, प्रमाण ही समझ, समझ ही प्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष ही कार्य व्यवहार, कार्य व्यवहार भी प्रमाण, प्रमाण ही जाग्रत परंपरा, जाग्रत परंपरा ही सहअस्तित्व।
उत्तर: ठीक है। यह ऐसा कुछ सूत्र बना- जहाँ से शुरू किये थे वहां तक पहुँच गए। इस मुद्दे पर थोड़ा सा प्रकाश डालना चाहूंगा। उसके लिए अनुमति चाहिये। तो मूल में क्या है, हम अभी तक जो सोचे थे वो एक अनुग्रह विधि से सब कुछ- ईश्वर वाद। उसके बाद सारे विकास के नाम से शुरू किया विज्ञान। विज्ञानं एक सीधा गति है ऐसा शुरू किया उसके बाद उसमे जोड़ हुई थोड़ा सा, कि सीधा भी है तिर्यक् भी है। माने थोड़ा सा टेढ़ा भी है और सीधा भी है, ऐसा सीढ़ी बनाया। कब तक पूछा तो - अंतविहीन। कभी समाप्त नहीं होगा विकास, उनके अनुसार [विज्ञान के अनुसार] यहाँ पहुंचे हम। ईश्वर वाद के अनुसार अनुग्रह से सृष्टि, स्थिति, लय होती है। ये उन लोगों ने बताया अपने ढंग से। उससे भौतिकवाद राज़ी नहीं हो पाया इसलिए प्रतिक्रिया विधि में वो चल दिए। अभी जो है ना ईश्वरवाद भी भौतिकवाद के पास आकर के कह रहा है - ये सब विज्ञान ठीक है। पहले उसको गाली देता रहा, और सूली चढ़ाता रहा, अभी उसको पूजा करता है। बात बताया है एक -ये घटनाक्रम यहाँ आया।
हम जो समझा -दोनों में जो घोषणाएं हुईं हैं तौर तरीका अपनाये हैं उसमे मूल में पीछे के मुद्दे पर बताया था ‘कर के समझो’, करके समझने में हम कही पहुँचते ही नहीं, क्योंकि करके समझने जाते है कुछ त्रुटियां होती हैं, उन त्रुटियों को ठीक करने जाते है कुछ और त्रुटियां होती है उस को ठीक करने जाते है और त्रुटि…. ऐसा त्रुटि में हम फंस गए। त्रुटियों के चंगुल में ही फंस गए हम। अंततोगत्वा हम कुंठा निराशा के शिकार हो गए। हमने यह मान लिया ये सब शास्त्र ठीक है, और ये लिखा हुआ ठीक है, हम बेवकूफ हैं। इस कुंठाग्रसित होने के योग्य हुए ईश्वरवादी विधि से। इस ढंग से शास्त्र में भी लिखा है आदमी अल्पज्ञ है, पापी है। अब ये आ गए तो क्या शुरू किया कि वस्तु को हम कैसे आदमी की सुख सुविधा के लिए प्रस्तुत करें, अपने विज्ञान के तौर तरीका को ये मान लें। विज्ञान का तौर तरीका क्या है- युद्ध करना है, युद्ध के सामरिक तंत्रों को उज्जवल बनाना है, श्रेष्ठ बनाना है, बढ़िया युद्ध करना है। उसके पहले भुजबल था जिसमें तलवार चलाना तक पहुंचे थे। तलवार चलाने से बंदूक में अंतरित हुए। तलवार के पहले गुत्थम-गुत्था, मुष्टि युद्ध, उसको द्वंद युद्ध कहते थे, मल्ल युद्ध कहते थे। इस प्रकार से हमारा किताबों में नाम दिया है, भागवत में रामायण में। वहां से चल करके हम यहाँ आ गए कि यहाँ बैठे रहते हैं, यहाँ से कोई बटन दबाते हैं वहां बम विस्फोट होता है।बस यहाँ पहुँच गए। यहाँ पहुँचने के बाद अभी सोचने की मुद्दा तो बनी ही है, इससे कैसे पार पाया जाए। वो अपने जगह की संकट की व्यवस्था बन गयी। अपने ही किया हुआ अपने संकट की व्यवस्था बन चुकी है। एक तो ये बनी और हम जो बनाया उसे प्रयोग कर हम भी नहीं बचेंगे, ये भी एक संकट की व्यवस्था बन गयी। अब दोनों तरफ में किस ओर दौड़ना है दौड़ लो, कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। उसके लिए हम ये कहे हैं “समझ के करो”। समझ के करने से क्या होगा- सबका प्रतिष्ठा है। जितने भी सब खनिज तंत्र हैं उसका अपना प्रतिष्ठा है, उस प्रतिष्ठा में हरियाली का बीज समाया है। रसायन तंत्र आयी हरियाली आयी, हरियाली में जीव प्रतिष्ठा का बीज समाया है। जीव प्रतिष्ठा प्रकट हो गई उसमें मानव को प्रकट करने की बीज समायी है। मानव आ गया मानव में मानव चेतना,