की विधि change हुई और प्रमाण की स्वीकृतियां change हुई। अब ये जो अनुभव मूलक विधि से प्रमाण होना चाहिए, या प्रत्यक्ष अनुमान आगम विधि से होना है, या शब्द प्रमाण के आधार पर होना है, ये सोचने का मुद्दा है। सोचने से यदि किसी को लगता है कि अनुभव प्रमाण मूलक विधि से ही हमारा प्रमाण पूरा पड़ता है तो ऐसे में वो निष्ठावान होगा ही। ऐसा मेरा सोचना है।
प्रमाण के लिए क्या बोला था “समझ के करो”, समझ क्या है- ज्ञान। ज्ञान क्या है- अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान। ये स्पष्ट हो चुकी है। इसको अध्ययन किया जा सकता है, ये आपको भी विश्वास हुआ है, मुझको भी विश्वास हुआ है। आप भी अध्ययन कराते हो मैं भी अध्ययन कराता हूँ। ठीक है ना? ये ज्ञान ही है जो अध्ययन कराया जा सकता है। बाकि को क्या अध्ययन कराना है? बनता भी नहीं है। जो अध्ययन करना बनता नहीं है उसको अध्ययन मान रहे हैं, जो अध्ययन करना होता है उसको अध्ययन मान नहीं रहे हैं। ये ज़बरदस्ती हो गया कि नहीं। मानव ज़बरदस्ती पंथ में चल दिया थोड़ा सा। उससे जो होने वाला था हो गया।दुःख पाया, tourist होने के लिए कुछ ज़बरदस्ती पंथ में चलना भी पड़ता है। बात ऐसा है।
जिज्ञासा: आगे बाबा -यथार्थ। उसमें कुछ बिंदु हैं-“ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत”।
उत्तर: इसको हम लिखे है। इसके पहले हमारे बुज़ुर्गो ने लिखा था- ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। उसके बदले में हम लिखे हैं- “ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत”। ब्रह्म में सभी प्रकृति काम कर रही है इसीलिए प्रकृति नित्य है, जगत नित्य है ऐसा लिखा है।
जिज्ञासा: ब्रह्म व्यापक, जीवन पुंज अनेक।
उत्तर: ब्रह्म व्यापक रूप में स्थित है जो पारदर्शी, पारगामी और व्यापक। तीन Qualification लिखा है। ये तीनो चीज़ ब्रह्म का स्वरुप में दिखता ही है। हम समझाते ही हैं और समझते भी हैं। जो ब्रह्म वस्तु है उसमे सभी वस्तुएँ होने के आधार पर, जो जड़ चैतन्य प्रकृति की बात की है, चैतन्य प्रकृति को जीवन कहा है। जीवन पुंज के रूप में ही जीवन रहता है, जो अपनी लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई से अधिक अपने कार्य गति पथ में रहता है। ये बात बताया, ये बात हो गयी है।
जिज्ञासा: जीवन पुंज में अविभाज्य आत्मा, जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव का वैभव है।
उत्तर: जीवन पुंज में आत्मा अविभाज्य रूप में रहता ही है, यद्यपि सभी अवयव अविभाज्य हैं। बुद्धि भी, चित भी, वृति भी और मन भी, चारों अवयव आत्मा के साथ अविभाज्य रहते हैं। इन चारों के साथ आत्मा अविभाज्य रहता है। ऐसा लिखा है।
जिज्ञासा: ईश्वर एक देवता अनेक।