जिज्ञासा: जीवन नित्य, जन्म मृत्यु एक घटना
उत्तर: शरीर के साथ जन्म और मृत्यु लगी है, गर्भाशय में शरीर रचना होता है ये सबको विदित है। गर्भाशय के बाद जन्म होता है, और जन्म के बाद बड़े होना होता है, वृद्धापे होना होता है शरीर में जो कोषायें बनते है, वो शरीर में जितना क्षय होते हैं उतना बन नहीं पाते हैं धीरे-धीरे मृत्यु की ओर , विरचना की ओर चले जाते हैं उसको हम मृत्यु कह रहे हैं।
जिज्ञासा: अगला Topic है बाबा -वास्तविकता। इसमें आपने लिखा है विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति, जागृति पूर्वक अभिव्यक्तियाँ और परंपरा।
उत्तर: इतना ही बात है। वास्तविकता क्या है- चार अवस्था या चार पद। ये ही वास्तविकता। वस्तुएं जो कुछ भी प्रगट कर रहे हैं वो सब वास्तविकता है। वैसे मानव को जागृति के पद में ही व्यक्त होना, प्रगट होना वास्तविकता कहा है। भ्रमित होकर के जो प्रगट होता है उसे हम वास्तविकता कहा नहीं, दुख को वास्तविकता कहा नहीं। बुद्ध ने कहा दुःख ही एकमात्र सत्य है, नाम दिए हैं। तो हम दिए हैं- दुःख घटना है, घटनाएं परंपरा नहीं हैं। अभी रेल दुर्घटना, रेल दुर्घटना क्या परंपरा हो सकती है क्या?
जिज्ञासा: परंपरा से आपका आशय बाबा?
उत्तर: वो जो हर दम होते रहे। अपनी बेवकूफी से दुर्घटना। मानव जाति की बेवकूफी बराबर दुर्घटना। जितने भी दुर्घटनाएं हैं मानव जाति की बेवकूफी से ही होती है, नहीं तो दुर्घटना का कोई स्थान नहीं। किस विधि से- समझ के जीने से दुर्घटना का कोई स्थान नहीं है। आप दुर्घटना चाहेंगे कि दुर्घटना नहीं चाहते हैं? नहीं चाहते हैं। इससे ज्यादा प्रमाण क्या होगा।
जिज्ञासा: ये जो आप ने कहा बाबा की भ्रम पूर्वक जो है उसे आप वास्तविकता नहीं कह रहे हैं, उसे एक घटना कह रहे हैं। थोड़ा इसमें भेद और स्पष्ट करें।
उत्तर: घटना जो है हम चाहते नहीं हैं, जिससे मुक्ति पाना चाहते हैं, वो सब घटना ही है अभी जैसे जन्म मृत्यु को एक घटना कहा, मृत्यु को थोड़ा ही चाहते हैं। जन्म तो चाह रहे हैं, मृत्यु को नहीं चाह रहे हैं वो कैसे बताया रासायनिक भौतिक वस्तु में परिवर्तन होता है, इसलिए इसमें रचना विरचना होती है, जीवन नित्य है, अमर है ये बात कहा है। अमर वस्तु को पहचानने की आदिकाल से तृषा रही। उसको जीवन रूप में पहचाना जा सकता है, ये लिखा है।
जिज्ञासा: आगे है ज्ञान- जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व रुपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान, अनुभव ही ज्ञान।