देव चेतना, दिव्य चेतना का बीज समाया हुआ है। उसको छोड़ दिया, तिल अक्षत ले कर तर्पण कर दिया उसको तिलांजलि कहते हैं, उसके साथ फूल मिला लिया, उसे कहा श्रद्धांजलि। श्रद्धांजलि, तिलांजलि दोनों देकर के हम चले हैं। किस बात की- हम अपने में सुधरने से विमुख हो कर सुधार की ओर तिलांजलि, श्रद्धांजलि समर्पित कर दिये। अभी जगह नहीं है किस ओर जाएं। उस आधार पर हमने इस बात को तय किया यदि आदमी सुधरेगा धरती के साथ अपराध मुक्ति होगी और अपराध मुक्ति होने से धरती में बची-खुची ताक़त अपने को सुधारने में लगेगी। ऐसा मैं सोचा इसमें किसी को कोई तकलीफ? किस प्रजाति की तकलीफ? बात ऐसा बन जाता है। इस तरह से हम कहाँ पहुँचे ?उसमे मनुष्य को ईश्वर के कृतज्ञ होकर जीना था, इसमें विवश होकर जीने की बात आयी, अब प्रमाण पूर्वक जीना के लिए हम शुरू करते हैं। इसकी आवश्यकता है कि नहीं? प्रमाण क्या होगी, पूछा तो- अनुभव प्रमाण, व्यवहार प्रमाण, और प्रयोग प्रमाण। प्रयोग प्रमाण को इस जगह में बताया है- हमारे आवश्यकीय वस्तुओं को निर्माण करने में सदा प्रयोग होगी, व्यवहार प्रमाण मनुष्य के साथ होगी, और अनुभव प्रमाण व्यवस्था के रूप में होगी। तीन के लिए तीन जगह बताया। उसके बाद व्यवस्था कैसा होगा उसमें भी हम पहुंचे हैं। और व्यवहार कैसे होगा उसमें भी हम पहुंचे हैं। ये तीनो जगह में प्रमाणित कैसे होंगे उसका सूत्र व्याख्या भी प्रस्तुत किया। इसके पहले प्रमाण प्रस्तुत कैसे किया- विज्ञानी प्रयोग को प्रमाण मानते हैं। प्रयोग में क्या चीज़ है- यंत्र। यंत्र जो बोलता है वो सत्य है ऐसा मानते हैं। उसी आधार पर अपनी तबियत को बताने के लिए भी यंत्र को launch किया, इस प्रकार हम आ रहे है, यंत्र के प्रमाण के तले हम अपने को सुखी होने के लिए बहुत सारा प्रयत्न बना रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। उसमे कुछ आसार भी दिखता है, किसी में तो आसार भी नहीं दिखता, दोनों चीज़ हो रही हैं। होते-होते कहीं पहुंचेंगे, अपनी गति है। तो इस बीच हमने प्रस्ताव रखा कि मनुष्य अनुभव प्रमाण पूर्वक जीना व्यवस्था में बनता है। व्यवहार प्रमाण पूर्वक जीना अखंड समाज के रूप में मानव के साथ जीना बनता है, और प्रयोग प्रमाण पूर्वक जीना हमारी आवश्यकता के रूप में छह प्रकार के वस्तुएँ होते हैं- आहार, आवास, अलंकार, दूर श्रवण, दूर गमन, दूर दर्शन, इन वस्तुओं को उत्पादन करने के रूप में हम प्रयोग करते हैं। इस ढंग से यदि तीन प्रकार से प्रमाण प्रस्तुत करने का यदि हम परम्परा बनाते हैं मनुष्य समाधान पूर्वक, समृद्धि पूर्वक जीना बनता है। व्यवस्था में जीना बनता है। ये प्रस्ताव के लिए ये तीन प्रमाण रखा। और इसके पहले हमारे बुज़ुर्गों ने प्रमाण के बारे में प्रस्तुत किया- पहले शब्द प्रमाण बताया। शब्द प्रमाण के आधार पर बहुत बड़ी भारी literature लिखा उसका नाम है कठोपनिषद। उपनिषद पूरा का पूरा इसी के लिए waste हुई है कि शब्द ही प्रमाण है। उसमे ये प्रतिपादित किया है प्रणव शब्द को शब्द माना है। उसके बाद वेद को शब्द माना, ऐसा माना है।
इसमें ब्रह्मसूत्र में ये लिखा है "ईक्षतेर्नाशब्दम्"। शंकराचार्य जी ने व्याख्या किया है, तीनो वेद के शब्दों से इसको वर्णन किया नहीं जा सकता। इस ढंग से वेद को भी शब्द माना है उसके पहले ओमकार को, प्रणव को, शब्द माना। उसके आधार पर ये कहा ‘शब्द ही प्रमाण है’। उसके बाद उसके संरक्षण में व्याकरण आयी। व्याकरण के अनुसार शब्द को ही पद माना। उधर प्रमाण माना ये पद माना। प्रमाण ,पद ये ही है, ये मना दिया। वो समय चला बहुत उथल पुथल हुई, आपके सामने इतिहास है ही।
और उसके बाद “आप्त वाक्यं प्रमाणम्”, शब्द प्रमाण के बाद। उसके बाद "प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि"- प्रत्यक्ष रूप में जो होता है प्रमाण इत्यादि। उसके बाद चौथा बताया है शास्त्र प्रमाण। करीब-करीब सभी शब्द ही है ऐसा बात माना जाये। उसके बदले में हम इन तीन प्रमाण को अपन अभी प्रतिपादित कर रहे हैं। प्रमाण change हुई, प्रमाण