हमारा संतान ख्याति प्राप्त करेगा। क्या ख्याति? वेद मूर्ति बनेगा, विद्वान बनेगा और शास्त्रार्थ में लोगों को परास्त करेगा, अपना खड़ाऊ को दूसरों के पूजा घर में रख आएगा। यहाँ तक नमूने प्रस्तुत किये हैं।
इस बात को स्पष्ट करता रहा कि जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो- ये लिखा है। इस मुद्दे को अच्छी तरह से लोकगम्य होने के लिए स्पष्ट करता रहा। मूल मुद्दा अभी तक की हमारी यात्रा रही, ईश्वरवादी विधि से, भौतिकवादी विधि से, ‘करके समझो’। हम अभी शुरू किये हैं- ‘समझ के करो’। यह बात कुछ तो आपको समझ आ गया है। इसके साथ इसको जोड़ सकते हैं कि जितने भी हम प्रयोगों में व्यर्थता को प्रयोग करते हैं, प्रयोजन के अर्थ में प्रयोग करना बन जाता है इससे। कैसे? तो हम पहले जान लेते हैं- भौतिक वस्तु का क्या प्रयोजन है, भौतिक कार्य कलाप का क्या प्रयोजन है, भौतिक परिणाम का क्या प्रयोजन है? उसके बाद रासायनिक वस्तुओं का क्या प्रयोजन है, रासायनिक परिणामों का क्या प्रयोजन है, रासायनिक स्थिति गति का क्या प्रयोजन है? इन तीनो चीज़ को हम अध्ययन कर लेते हैं। उसके बाद जीवों का क्या प्रयोजन है? भुनगी का क्या प्रयोजन है? सभी का प्रयोजनों को हम पता लगा लेते हैं, इसका नाम है जानना। इसी प्रकार मानव का प्रयोजन को पहचानते हैं। उसके बाद इन सबका प्रयोजन को जानकर, मानकर, प्रयोग करना बनता है, इसके पहले बनने वाला नहीं। मानव अपने प्रयोजनों को पहचानना होगा, जीव संसार के प्रयोजनों को पहचानना होगा, वनस्पति संसार के प्रयोजनों को पहचानना होगा, और खनिज संसार के प्रयोजनों को पहचानना होगा। जानना होगा अच्छी तरह से, जानने के बाद मानना होगा। जानने मानने के बाद ही पहचानने निर्वाह करने की बात आती है। यह इसके साथ जुड़ती है, अभी इसको स्पष्ट करेंगे और थोड़ा सा।
भाई, पदार्थ संसार का क्या प्रयोजन है? अभी इसके पहले एक सूत्र आपको सुनाये थे- ‘हर आगे के प्रगटन के लिए बीज पीछे स्थिति में बना रहता है’। परमाणु अंश में परमाणु बनने का बीज बना है, परमाणु में अणु बनने का बीज बना हुआ है, अणु में रचना की बीज बनी हुई है, रचना- बड़े से बड़े रचना धरती है। धरती में रसायन संसार का बीज बनी हुई है, रसायन संसार में जीव संसार का बीज बनी हुई है, और जीव संसार में मानव संसार उदय होने का बीज बना रहता है। यह बात हमको अच्छी प्रकार से सोचना पड़ेगा। ये प्राकृतिक गवाही है। क्योंकि भौतिक संसार समृद्ध होने के बाद ही रसायन संसार प्रकट हुई, रसायन संसार प्रकट होने के बाद ही जीव संसार प्रकट हुई, जीव संसार प्रकट होने के बाद ही मानव संसार प्रकट हुआ है। यह गवाही रखा ही हुआ है। उसके बारे में और कोई बहुत बड़ी laboratory बनाने की ज़रुरत नहीं है। प्रकृति में जो गवाहीयां रहते हैं वो ज़्यादा से ज़्यादा उपयोगी, सबको समझ में आने वाला होगा, ऐसा मेरी स्वीकृति है। हम घर में बना लेते हैं, एक छोटे से कमरे में बना लेते हैं, वो सबके पहुँचने वाला नहीं होगा। ये प्रकृति में जो व्यवस्था है, ये सबको पहुँचने वाला है, सभी व्यक्ति प्रकृति से जुड़ा ही है। मानव है, बाकि तीनों प्रकृति से जुड़ा ही है। पदार्थ है, बाकि तीनों प्रकृति से जुड़ा ही है, रसायन संसार है, बाकि तीनो प्रकृति से जुड़ा है, जीव संसार है, बाकि तीनो प्रकृति से जुड़ा ही है। अकेले में कोई चीज़ नहीं है ये बात समझ में आता है। इसका कारण बताया था कि सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है। व्यापक वस्तु जैसा निर्मल वस्तु, कोई भी उसकी ज़रुरत नहीं है, ज़रुरत का खाका उसमे नहीं है, ज़्यादा कम का खाका उसमे नहीं है, परिणाम का खाका उसमे नहीं है, परिवर्तन का ख़ाका उसमे नहीं है। और ऐसी पावन वस्तु सहअस्तित्व के बिना प्रमाणित नहीं हो पाया, इससे बड़ी चीज क्या बताएं। इससे बड़ी चीज बताया नहीं जा सकता। अभी मनुष्य ज्ञान सम्पन्न होने के पश्चात् चारों अवस्था के साथ ही प्रमाणित होगा। चारों अवस्था में किसी को हम लात मार देंगे, किसी को लूट मार देंगे, किसी को सेंध