उत्तर: इतना ही अनुभव की मुद्दा है, ये ज्ञान ही अनुभव है। ये ज्ञान का प्रगटन ही प्रमाणिकता है। ज्ञान हुआ हम दृष्टा पद में हुए, समझदार हुए माने दृष्टा पद में हुए और उसको प्रमाणित किये माने जागृत हुए। इतनी ही छोटी सी बात है। माने समझना भी है प्रमाणित करना भी है ये सबके साथ जुड़ा है कि नहीं है। बात इतना ही है।

जिज्ञासा: अनुसंधान- गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता।

उत्तर: जो कुछ भी परंपरा में था नहीं वो क्या कर दिया पूछे, उसके लिए ये अनुसंधान नाम दिया। जो अभी तक जितने भी अनुसंधान किये या शोध किये उससे ये बात मिला नहीं था। गठन पूर्णता पाठ रूप में एक शैक्षणिक विधि से हमको अभी तक मिला नहीं था, और क्रिया पूर्णता आचरण पूर्णता का ज़िक्र ही नहीं है। इस ढंग से गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता को अनुसंधान रूप में पूरा का पूरा दर्शन प्रस्तुत किया है। ये अनुसंधान की वस्तु है। 

जिज्ञासा: यह नयी मौलिक बात आप कह रहे हैं, इस तरह से यह कहने की बात है। इसके बाद है बाबा, आधार- सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति ( सहअस्तित्व)

उत्तर: ये जो गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता को बताया, इसको कहाँ तुम पता लगाया पूछा- यह सहअस्तित्व रुपी अस्तित्व में पता लगाया। वही है सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति। सहअस्तित्व में यह तीनों पूर्णता को हमने पता लगाया। उसको लोक सम्मति के लिए प्रस्तावित भी किया है। 

जिज्ञासा: ये जो आप कहते हैं पता लगाया या आपने अध्ययन किया ........ 

उत्तर: वही अनुभव किया, मैंने जो अनुभव किया उसको हम आदमी के सामने प्रगट किया। 

जिज्ञासा: इसको थोड़ा और बताएँ,अनुभव को हम कैसे समझें? 

उत्तर: आपको इसके लिए बोध करना होगा। बोध तक अध्ययन करना होगा बोध के बाद प्रमाणित करने की संकल्प होता ही है, वो अनुभव मूलक विधि से ही आता है। हर व्यक्ति में यह क्रिया रखा हुआ है, अनुभव क्रिया केवल मेरे में ही रखा है ऐसा कोई speciality नहीं है, हर व्यक्ति में अनुभव ये क्रिया की सम्भावना बनी हुई है। उसको प्रयोग करने की बात है। अनुभव करने की योग्यता को हम दांव में लगाने की बात, उसकी विधि को बताया। अध्ययन पूरा होना पड़ेगा, जिससे सत्य बोध होना पड़ेगा, सत्य बोध होने के बाद प्रमाणित करने की संकल्प होते ही है, संकल्पित करने के क्रम में अनुभव होकर ही सभी प्रमाणित होती है। ऐसा मैं लिखा। तो हमको जो अनुभव हुआ, वो सबको अनुभव होगा। उस आधार पर हम प्रस्तुत किये हैं। यदि हमको अनुभव होगा आपको नहीं होगा तो प्रस्तुत करने की क्या आवश्यकता है, पहले से ही हमारे बज़ुर्ग लोग कहे हैं। 

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