जिज्ञासा: जिस प्रकार से आप कहते हैं अंश व्यवस्था में प्रवृत्त होते हैं और परमाणु है, इस तरह से सभी को देखने की…

उत्तर: अभी विज्ञान जहाँ तक पहुँचा है, ये भी हमको पता लगा बाद में, विज्ञान कुछ गतिविधि तैयार किया है, उसमें कुछ परमाणु के बारे में भी सोचा, सोचने पर उसमें उसकी गतिविधियों को हम अध्ययन करने पर ये सब पता चला। विज्ञान पढ़ा हुआ व्यक्ति इस विधि को स्वीकारता है। इसमें कोई तकलीफ नहीं। क्या इसमें विशेषता आ गयी? विज्ञान में गठन पूर्णता का ज़िक्र नहीं है, क्रिया पूर्णता और आचरण पूर्णता तो है ही नहीं। गठन पूर्णता की ही ज़िक्र नहीं है। गठन का जिक्र है, इस बात की बात है, तो उसमे गठन पूर्णता की बात आने से, ये गठन के जो ज्ञान विज्ञानियों को विज्ञान शिक्षा में आता है, उनके लिए एक बहुत अच्छी वरदान जैसा लगता है। अब आप तो उससे गुजरे ही हो। 

जिज्ञासा: इसके बाद है बाबा प्रतिपादन- भौतिक, रासायनिक प्रकृति ही विकास क्रम में है , जीवन विकसित रूप में चैतन्य इकाई है। 

उत्तर: विकास और विकास क्रम को कहाँ रेखाकरण किया- भौतिक, रासायनिक रूप में जितने भी कार्य कलाप हैं वह विकास क्रम में हैं, और जीवन विकास पद में प्रतिष्ठित है। वो जीव प्रकृति में, जीवनी क्रम, में जीने की आशा सहित, जीने के रूप में देखा गया। मानव कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता सहित जब जीने की आशा शुरू किया, जीवों से अच्छा जीने के लिए प्रयत्न शुरू किया। वो सब तो कर ही चुका है, तो दो सौ पचहत्तर मंज़िल की मकान बना डाला। और उसको ध्वस्त करने की व्यवस्था भी पा लिया, अब क्या चाहते हो बताओ? सब कुछ तो हम कर लिए हैं।

जिज्ञासा: चैतन्य इकाई अर्थात जीवन ही जागृति पूर्वक मानव परंपरा में अखंड सामाजिकता सहज प्रमाण। 

उत्तर: जागृत जीवन ही किस बात का प्रमाण? जाग्रत जीवन अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था का प्रमाण होगा, प्रमाण है। क्योंकि मै हूँ इसी कारण से ’ है’ लिखा है।

जिज्ञासा: सतर्कता पूर्ण मानवीयता एवं सामाजिकता, प्रतिपादन है बाबा। 

उत्तर: प्रतिपादन में जब कभी भी क्रियापूर्णता होता है, सर्वतोमुखी समाधान संपन्न होता है, समाधान आने के बाद समस्याओं का दृष्टा बना रहता है। समस्याओं को अलग से अध्ययन करना नहीं बनता है। जैसे गणित को हम सही करना सीखते हैं , गलत करने के लिए अलग से अध्ययन करना नहीं होता है। गलती को समझने के लिए, उसको ठीक करने के लिए हमको अलग से अध्ययन करना नहीं होता है, सही किए हुए के आधार पर हम सारी गलतियों को सुधार लेते हैं, इसी का नाम है सतर्कता। सभी बातों को सुधार लेने की क्रिया अपने में आ जाती है, ये लिखा है। जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन हुआ, तो हमको सारे गलतियों को सुधारने की जगह बन जाती है। इसलिए

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