हम ने लिखा है “व्यवस्था पूर्वक मानवीयता एवं सामाजिकता।” मानवीयता को हम स्वयं प्रमाणित करते हैं फलस्वरूप सामाजिकता स्वयं प्रकट होने लगती है।
जिज्ञासा: अगली बात है, सतर्कता पूर्ण सजगता सहित देव मानवीयता।
उत्तर: सतर्कतापूर्ण- सतर्कता पूरा हो गया तो गलतियाँ कुछ रह ही नहीं गयीं, तब सजगता की जगह में आ गये। सजगता के साथ सतर्कता देवमानव चेतना को प्रमाणित करना शुरू किया। देव मानव में क्या होता है बोले? पुत्रेष्णा वित्तेषणा गौण हो गई केवल लोकेषणा रह गई। दिव्य मानव चेतना में क्या होता है? लोकेषणा भी नहीं रह जाती है। इसलिए दिव्य मानव चेतना नाम दिया। इतनी ही तो बात है।
जिज्ञासा: अगली लाइन में वही लिखा है बाबा- सजगतापूर्ण सहजता सहित दिव्य मानवीयता। तो यहाँ पर सजगता पूर्ण हो गई?
उत्तर: सहजता क्या है? सहअस्तित्व सहज है, सहअस्तित्वपूर्ण माने इसके पहले लोकेषणा में थोड़ा सा शेष, मानव चेतना में और थोड़ा सा ज्यादा शेष और जीव चेतना में निःशेष माने कोई बात सही की रही ही नहीं। यानी कि ऐसा हम रहे वहाँ से थोड़ा अच्छे ढंग से जीने लग गये और थोड़ा सा हम समस्याओं को देखते रहे, समस्याओं को समाधान करते रहे मानव चेतना में, देव चेतना आ गया समस्याओं को समाधान करने की ज़रूरत नहीं सब समाधान युक्त हो गये, अब केवल हम उपकार करने लगे। उसमे क्या था? तीनों एषणा सहित उपकार। इसमें क्या हो गया? केवल उपकार सहित उपकार और उसके बाद जो है लोकेषणा मुक्त विधि से उपकार, पहचान के बिना ही उपकार करते हैं, ये बात आ गई। इस ढंग से मनुष्य की श्रेष्ठ चेतना का प्रमाण बनाता है। ये इशारा किया है।
जिज्ञासा: मानव चेतना में आपने कहा कि समस्याओं का समाधान करते रहे, इसका क्या मतलब हुआ बाबा?
उत्तर: हमारे पास समाधान हो गई, समस्या को समाधानित करने के लिए हमारे पास अधिकार रहता ही है। जैसा अभी किया हुआ जो गलतियाँ (धरती के साथ)हैं उसके लिए हम क्या समाधान प्रस्तुत कर सकते है यह निकलने लगता है। जैसे: वनस्पति संसार में हम क्या मदद कर सकते है, उपकार कर सकते हैं, जीव जाति के लिए क्या उपकार कर सकते हैं, मानव जाति के लिए क्या उपकार कर सकते हैं, ये आता है। काहे के लिए? उसमें समृद्धि हो, समस्या से मुक्ति हो, यह सब रहता ही है। उस ढंग से आ कर के मानव, परंपरा को अत्यंत उपकारी प्रवृत्ति में डाल देता है। उपकारी प्रवृत्ति में डालने से उपकार जब आगे बढ़ता है तो उसमे पुत्रैषणा वित्तेषणा का बहुत प्रधान रूप रहता है, समान रूप रहता है ,मानव चेतना में। देव चेतना में केवल लोकेषणा प्रधान हो जाता है। ये दोनों छोटा पड़ जाते हैं, उसके बाद आगे उपकार करने की विधियाँ ज्यादा बढ़ता है और केवल उपकार रह जाता है दिव्य चेतना में।
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