भाग – 4
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जिज्ञासा: बाबाजी, जो आगे है, सत्यता, सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति ही सृष्टि, प्रकृति ही नियति, नियति ही व्यवस्था, व्यवस्था ही विकास एवं जागृति।
उत्तर: सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति ही सम्पूर्ण सृष्टि, वो सृष्टि ही रहेगी, लय होता ही नहीं। अभी तक अपने सिर में यह भूत चढ़ा है, सृष्टि, स्थिति, लय होता है। अपने दिमाग में क्या चढ़ा है? सृष्टि होता है, लय होता है, स्थिति होती है। ऐसा अपने दिमाग में भरा हुआ है। उसमे परिणतियाँ होती है, लय होती नहीं। ठीक है? यह बात को अपने को पकड़ना है। जब लय होता ही नहीं है, उसको, (यथास्थिति को) बनाये रखने के लिए क्या विधि है, ये बात को सोचना बनता है। यदि लय होता है, जल्दी सृष्टि को लय होने में ही अपन मदद करते हैं। लय को अपन क्या माने हैं? परिणतियों को अपन मानते हैं लय। जैसा शरीर, गर्भाशय में रचित हुई और उसके बाद बड़े हुए, शरीर विलय हो गयी उसको अपन मृत्यु कहते हैं, विलय कहते हैं, लय कहते हैं। इस ढंग से अपन माना है। जबकि शरीर की सभी वस्तुएं धरती में ही रहते हैं, धरती के वातावरण में ही रहता है, कोई चीज़ भाग ही नहीं सकता,मतलब परिणति हो गए। और रासायनिक भौतिक वस्तुएं, ज़्यादा से ज़्यादा रासायनिक वस्तुएं, रचना विरचना में जल्दी होते हैं। रासायनिक भौतिक वस्तुओं के साथ ही शरीर रचना बना रहता है, और रासायनिक भौतिक वस्तुओं में परिणतियाँ निरंतर हैं, उसको अपने को ध्यान में रखने की ज़रुरत है। उस ढंग से क्या है, जीवन जो है नित्य है, जीवन नित्य होने के आधार पर हम निरंतर अपने को बनाये रख सकते हैं, क्योंकि आगे शरीर यात्रा में भी हमको यही चाहिए। जो जागृति की रास्ता है वो हमको यही चाहिए, ज्ञान की रास्ता है यही चाहिए, इस ज्ञान संपन्न शिक्षा की रास्ता है वही चाहिए, और निरंतर व्यवस्था में जीना है ये व्यवस्था ही चाहिए, ऐसा ही बात आती है। इस ढंग से हमारे दिमाग में जो पहले से भरी हुई सृष्टि स्थिति लय है उसमें लय का कल्पना छोड़ देना चाहिए, परिणतियों को स्वीकारना चाहिए, परिणतियाँ रासायनिक भौतिक सीमा में होते हैं, इसको भी स्पष्ट कर लेना चाहिए, जीवन में कोई परिणतियाँ नहीं होती हैं, जीवन में यदि होता है, कमी रहती है, वह भ्रम के रूप में रहते हैं, उसको जागृति में परिणत होना है। ये बात बनता है।
इस ढंग से सृष्टि स्थिति लय के बारे में अपन आगे स्पष्ट किये हैं :
इकाई +अनुकूल इकाई =सृष्टि [सृजन] और उसके बाद लिखा है, अनुकूल इकाई सृष्टि हुई, सृष्टि के लिए पोषण इकाई =स्थिति, शोषण इकाई =परिणति [विलय] ये लिखा है। आगे चल करके इसको स्पष्ट किया है दर्शन में।
जिज्ञासा: व्यवस्था ही विकास एवं जागृति।
उत्तर: जागृति का यदि परंपरा कोई चीज है, तो व्यवस्था ही एकमात्र आधार है। व्यवस्था में जीने के आधार पर ही, परंपरा में जो कुछ भी संतान आती है, मानव संतान, उसको जागृति के लिए प्रेरणा देने की व्यवस्था शिक्षा ही है।