बंदूक से उनका मृत्यु हो जाता है, परतंत्र हो गया ना। नहीं हुआ? सही बात है ये? अच्छा, अभी विज्ञान जो है, ना इतना बड़ा विज्ञान community, fission fusion को प्राप्त कर लिया, उसको प्रयोग करेगा तो कोई आदमी ही नहीं रहेगा, धरती में। ये परतंत्र हो गया ना? [अपने किये हुए से ही परतंत्र हो गया], अभी इसी प्रकार से जितने भी नियति विरोधी, मानव विरोधी जितने भी फल परिणाम निकलते हैं उसको भोगने में परतंत्र हो जाता है, विवश हो जाता है। 

जिज्ञासा: मानव शरण- अखण्ड सामाजिकता। 

उत्तर: अखण्ड सामाजिकता ही एकमात्र शरण है। पहले हम क्या मानते रहे, ईश्वर ही शरण है। अभी क्या मानते हैं- सुविधा संग्रह ही शरण है। आज के मानव सुविधा संग्रह को शरण मानते हैं। इसके पहले हम ईश्वर को शरण मानते रहे।अब हम क्या कह रहे हैं, अखण्ड समाज ही मानव का शरण है। अखण्ड समाज में न्याय पूर्वक जीना बनता है, नियम पूर्वक जीना बनता है, समाधान पूर्वक जीना बनता है, समृद्धि पूर्वक जीना बनता है, सवर्ग तुल्य विधि से जीना बनता है। इसीलिए अखण्ड समाज ही हमारा शरण है। ये लिखा है, कितना बढ़िया है ! इसमें शायद ही किसी को तकलीफ हो, तो शुरुआत हो जाए, स्पष्ट हो जाए।

जिज्ञासा: मानवीय व्यवस्था- मानवीयता। 

उत्तर: मानवीय व्यवस्था में क्या चीज है, कुछ भी नहीं है, केवल मानवीयता है, मानवीयता निरंतर प्रगट रहना है। क्या चीज है वो? त्व सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी। मानवत्व सहित व्यवस्था में जीना और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना। ये दोनों चीज प्रगट हो जाती है, प्रमाणित हो जाता है, निरंतर मानवत्व है। मानवीयता ही एकमात्र शरण है। 

जिज्ञासा: व्यक्ति में पूर्णता- क्रिया पूर्णता और आचरण पूर्णता। 

उत्तर: जीवन में क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता। मानवीयता में क्या चीज रहती है- क्रिया पूर्णता रहता ही है। माने समाधान पूर्वक जीना बनता ही है, न्याय पूर्वक जीना बनता ही है, नियंत्रण पूर्वक जीना बनता ही है, नियम पूर्वक जीना बनता ही है। समाधान पूर्वक जीने से इतना सब आ गए। अब क्या बचा है भाई? अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में जीना। सार्वभौम व्यवस्था के रूप में जीने के लिए सत्य import होता है, सत्य आती है। सत्य क्या चीज है, सहअस्तित्व परम सत्य। सहअस्तित्व सूत्र व्याख्या रूप में ही हम सार्वभौम व्यवस्था में जी पाते हैं। अखण्ड समाज रूप में ही हम मानवीयता पूर्ण विधि से जी पाते हैं। माने अखण्ड समाज सूत्र व्याख्या में ही मानवीयता पूर्ण विधि से जी पाते हैं, अखण्ड समाज रूप में ही जी पाते हैं। अखण्ड समाज ना हो मानवीयता पूर्ण जीवन होते ही नहीं, सूत्र व्याख्या ना हो, (अखण्ड समाज सूत्र व्याख्या ना हो) ऐसे ढंग से हम समाधान पूर्वक जी ही नहीं सकते। हमारा सम्पूर्ण समाधान अखण्ड समाज सूत्र होगी व्याख्या होगी। 

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