क्या बात, कैसा पकड़ा है? इसको थोड़ा सा अच्छा पकड़ो, ये बहुत काम की है, ये बहुत ज्यादा काम की है। 

जिज्ञासा: बाबा आप कह रहे हैं अखंड समाज जब तक नहीं होगा ऐसा कह रहे हैं ?क्या कह रहे हैं? 

उत्तर: वही, अभी देखो ना अपन सुनने में, सुनाने में कितना दूरी हो गई। मैं बता रहा हूँ आप हम समाधान पूर्वक जीने से वो अखण्ड समाज का सूत्र होगी व्याख्या होती रहेगी, इसीलिए multiply होगी, ये मैं कह रहा हूँ। (परंपरा होगी ) ठीक है ना? अभी देखिए, तुम्हारा बोलने में क्या आ गयी, जब तक अखण्ड समाज नहीं होगा तब तक समाधान ही नहीं होगा। ऐसा आप कह रहे हो। ऐसा नहीं है। हम जहाँ समाधानित हुए, तो हम अखण्ड समाज सूत्र व्याख्या में ही जीते हैं। इसीलिए वो multiply होता है। यही मानवीयता है।मानवीयता पूर्वक जिए बिना ये multiply होने की बात ही नहीं है। इसीलिए पहले कहा है “जीयो और जीने दो ” सर्वप्रथम नारा वही है। तो हमारा जीने देने का क्या मतलब है भाई, हम दूसरे को हम समाधान पूर्वक जीने योग्य बनाते हैं तब जीने दिया। ये किये बिना हम जी ही नहीं सकते। हम प्रमाणित होने का विधि ही यही है, दूसरे को जीने दिया हम जागृत हुए, इसका प्रमाण हुआ। 

जिज्ञासा: इसका अर्थ ये हुआ बाबा एक व्यक्ति भी समाधानित होता है, तो अखण्ड समाज के लिए वो स्रोत बनता है। 

उत्तर: स्रोत बनता है वो, इतना ही बात है। वो ही आगे चल करके लिखा ही है। 

जिज्ञासा: अगला है बाबा, समाज में पूर्णता- सर्वतोमुखी समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व। 

उत्तर: यदि कोई चीज समाज में पूर्णता होती है, मानव परंपरा में अखण्ड समाज। सर्वमानव में जो यदि कोई चीज प्रमाणित होती है, वो ही चार चीज- समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व। अब उसको हम शुरू किये, इसी से जीवन मूल्य तृप्त होती है। समाधान से सुख; समाधान, समृद्धि से सुख, शांति; समाधान समृद्धि, अभय से सुख, शांति, संतोष; और समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व प्रमाण से सुख, शांति, संतोष, आनंद ये प्रमाणित होना शुरू करते हैं। मानव लक्ष्य पूरा होने से जीवन मूल्य प्रगट होता है। यह सिद्धांत है।मानव लक्ष्य को पूरा ना करें और हम जीवन मूल्य को प्रमाणित कर लें, ये होने वाला नहीं। पहले क्या किया जीवन तृप्ति के लिए, या जीवन मुक्ति के लिए, जीवन तृप्ति का तो नाम नहीं दिया है, और एक इसमें लिखा है, ” तृपतो भवति, कृत कृत्यो भवति सानंदों भवति “ये नारद भक्ति सूत्र में लिखा है। तो वो कब, सारूप्य हो गया, माने ईष्ट देवता के रूप में विलय हो गए। ऐसा लिखते हैं। इसको क्या प्रमाणित किया जा सकता है? भक्ति का अंतिम चोट में यह लिखा है। ईष्ट देवता के रूप मे स्वयं परिणित हो जाना। और उसके पहले क्या कहा था, ब्रह्म मे विलय होना। ये दोनों करीब-करीब एक ही है। ठीक है? ऐसा बात कहते हैं। इसको प्रमाणित करने का तो कोई chance ही नहीं। और ईष्ट देवता, जिनके लिए हो गया ईष्ट देवता उनके लिए प्रमाण हो गया वो तो परंपरा में आता नहीं, कैसा किया जाए। इसके लिए कहा क्या है, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीने से जीवन मूल्य प्रमाणित हो जाता है। और उसको उलटा भी कहा है आगे, कि जीवन मूल्य यदि प्रमाणित होता है तो मानव लक्ष्य पूरा होना स्वाभाविक है- ये लिखा है। जीवन मूल्य

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