तक अपने को काफी ये अनुभव होगा, हमारा तन, मन, धन रूपी अर्थ सुरक्षित है। उसके आगे चलने के बाद कहानी ही क्या है!

जिज्ञासा: अनुगमन और चिंतन- स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण, कारण से महाकारण। 

उत्तर: स्थूल क्या चीज है? धरती सबसे बड़ा स्थूल, मनुष्य का शरीर स्थूल शरीर। सूक्ष्म- जीवन सूक्ष्म, परमाणु सूक्ष्म। कारण- मनुष्य की जागृति का कारण ‘आत्मा’। आत्मा में अनुभव हुए बिना जागृति होना नहीं है। और भ्रम का कारण शरीर। शरीर को जीवन समझे बिना कोई आदमी भ्रमित होता भी नहीं है। दो ध्रुव रखा हुआ है। इस ढंग से हम भ्रम और जागृति का आधार मिल गए, कारण मिल गए, उसके बाद क्या लिखा? [कारण से महाकारण]। महाकारण क्या चीज है, तो व्यापक वस्तु महाकारण। व्यापक वस्तु में ही सभी कारण छुपा हुआ है, सभी कारण कार्य करता हुआ, देखने को मिलता है, इसलिए उसको महाकारण नाम दिया। ब्रह्म ही महाकारण है। ऐसा अपन प्रतिपादित किए हैं। 

जिज्ञासा: आत्मा जो है कारण हुआ, जो जागृति का कारण। 

उत्तर: जागृति का कारण, आत्मा है। आत्मा में ही अनुभव होगा। और महाकारण क्या है? सहअस्तित्व, और सहअस्तित्व जो है- ब्रह्म में ही संपूर्ण प्रकृति का होना। इस ढंग से महाकारण को बताया, सहअस्तित्व रूपी क्रियाकलाप को अपन महाकारण रूप में बताए। सत्ता में संप्रकृत प्रकृति। 

जिज्ञासा: अनुगमन और चिंतन पूरे से कहना क्या चाह रहे हैं बाबा ये एक बार स्पष्ट करें? 

उत्तर: अनुगमन जो है ना, सोच विचार अनुभव की मुद्दे, अनुगमन। चिंतन का मतलब है- प्रमाण करने की मुद्दे। प्रमाण करने की मुद्दा क्या है? जीवन लक्ष्य, मानव लक्ष्य को प्रमाणित करना है। वो क्या चीज है? अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में जीना है, ये हुआ प्रमाण परंपरा। और अनुगमन क्या हुआ? मानव शरीर को अध्ययन करना, सहअस्तित्व को अध्ययन करना, सहअस्तित्व में प्रकृति और व्यापक वस्तु की नित्य सहअस्तित्व को अनुभव करना। ये महाकारण रूप में मिल गए। ये कभी छूटता नहीं है। सत्ता अकेले हो जाए, वस्तुएँ अकेले हो जाए, ऐसा कभी होता ही नहीं, इसलिए सहअस्तित्व नित्य वर्तमान लिखा।

जिज्ञासा: जागृति का प्रमाण- अमानवीयता से मानवीयता, मानवीयता से देव मानवीयता, देव मानवीयता से दिव्य मानवीयता। 

उत्तर: ठीक है ना, ये समझ में आता है? जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ है, तो जीव चेतना में मानव चेतना का बीज समायी हुई है। मानव चेतना प्रमाणित होने के बाद देव चेतना, मानव चेतना में बीज रूप में रहता ही है, देव चेतना

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